राकेश शर्मा, पन्ना। विश्व प्रसिद्ध पवित्र नगरी पन्ना धाम में स्थित महामति श्री प्राणनाथ जी मंदिर जोकि लगभग चार सौ साल पुराना बताया जाता है। इस मंदिर में अष्ट प्रहर की पूजा-अर्चना की जाती है। इसी पूजा के तहत मंदिर में होने वाली आरती के लिए एक विशेष प्रकार की बाती का प्रयोग किया जाता है जो कि खस की लकड़ी व कपास से बनाकर शुद्ध घी में डुबोया जाता है। फिर उन्हीं बातियों से श्रीजी की आरती की जाती है।

हर दिन आरती में इस्तेमाल होती है 56 बाती

ब्रह्म चबूतरे पर महामति प्राणनाथजी के मुख्य मंदिर के साथ-साथ बंगला जी दरबार मंदिर भी है। इन दोनों मंदिरों में रोज चार-चार बार सात-सात बाती सजाकर आरती की जाती है। जिसमें पूरे दिन में कुल 56 बातियों का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा अन्य चांदी की आरती से भी श्रीजी की आरती भी उतारी जाती है। जिसमें इन दोनों मंदिरों में 52 बातियों का उपयोग होता है। इस प्रकार प्रतिदिन कुल 108 बातियों का उपयोग आरतियों के दौरान होता है।

एक ही परिवार के लोग बाती बनाकर करते हैं सेवा

श्री बंगला जी मंदिर में खस की लकड़ी व कपास से बाती बना रहे वहां के पुजारी रोशनलाल त्रिपाठी ने बताया कि बाती बनाने का काम हमारी पीढ़ियों से सेवा भाव से किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि लगभग बीस से पच्चीस सालों से मैं ही बाती बना रहा हूं। इसके पूर्व मेरे पिताजी पुजारी सुंदरदास भी यही सेवा करते थे तथा उसके पूर्व मेरे दादा लक्ष्मीदास भी आरती के लिए बाती बनाकर सेवा करते रहे। उन्होंने बताया कि पूरे दिन में दोनों मंदिरों के लिए 56 बातियों की आवश्यकता होती है और बातियों को बनाने के लिए घंटों का समय लगता है।

हमें जैसे ही समय मिलता है पूरी श्रृद्धा व भावना के साथ बाती बनाते रहते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान समय में खस की लकड़ी मिलना मुश्किल रहती है। इसीलिए हम दमोह जिले व गोरखपुर उत्तर प्रदेश से खस की लकड़ी मंगवाते हैं।

खस की लकड़ी बहुत ही शुद्ध व महकदार होती है जो बड़ी नदियों के किनारे ही उपलब्ध होती है। हमारी दिनचर्या में ही बाती बनाना शामिल है और हम प्रतिदिन बातियां बनाकर हमेशा स्टॉक में अतिरिक्त बातियां बनाये रखते हैं।

उत्तरप्रदेश के गोरखपुर से खस की लकड़ी मंगाते हैं

मंदिर में बैठे पुजारी रोशनलाल को जब हमारे प्रतिनिधि ने बडे ही श्रृद्धा और लगन के साथ बातियां बनाते देखा तो सहसा यह जिज्ञासा मन में उपजी और उनसे चर्चा की तो उन्होंने बाती बनाने के संबंध में पूरी कहानी बताते हुए कहा कि यह काम हमारे दादा-परदादा के जमाने से किया जा रहा है। उन्होंने यही भी बताया कि इन बातियों से की गई आरती से वहां के वातावरण में शांति व शुद्धता का एहसास होता है।

आरती उपरांत वहां उपस्थित प्रत्येक श्रृद्धालु सुंदरसाथ में यह भावना रहती है कि वह आरती की बची हुई लकड़ी को अपने माथे से लगाएं और ऐसा होता भी है। जैसे ही आरती पूरी होती है तो उपस्थित लोग उनको अपने हाथों से स्पर्श कर अपने माथे और आंख की पलकों पर लगाकर शांति की अनुभूति प्राप्त करते हैं।