विश्व के प्राचीन इतिहास में उल्लेखित है कि 1830 ई.पू. के लगभग अमोरी सरदार सुम्मू-आबू ने बाव इलू( बेबीलोन) नाम के एक छोटे से शहर को अपना केंद्र बनाकर एक नए राजवंश की नींव रखी थी। यही नगर आगे चलकर विशाल साम्राज्य की राजधानी बना।

प्राचीन काल के ही कुछ विद्वानों का मानना है कि प्राचीन सभ्यता बेबीलोनिया में बैबुली नाम का एक विशाल जिगुरत( मंदिर) था। जिसके नाम पर इस शहर का नाम बेबीलोनिया रखा गया। बेबीलोन में रहने वाले लोगों का मत था कि मृत्यु के बाद व्यक्ति को अंधेरी गुफा में जीवन बिताना होता है।

सुमेरियाई लोगों की तरह ही सुव्यवस्थित तरीकों से दर्शन का निर्माण नहीं कर पाए। बेबीलोनिया के लोग बहुदेववादी थे। उनके देवी-देवताओं की कुल संख्या 65 हजार थी। बेबीलोन में धर्म तीन स्तर में प्रचलित था पहला परिवार, दूसरा नगर और तीसरा राज्य। प्रत्येक परिवार का अपना कुलदेवता होता था। जिसकी वे लोग पूजा करते थे। देवी-देवताओं की मूर्तियां मिट्टी की बनाई जाती थीं।

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नगर में बड़े देवताओं के मंदिर होते थे। जिनकी पूजा पुरोहित करते थे। इस पूजा में कुलीन वर्ग के लोग ही शामिल होते थे। बेबीलोनवासियों ने सुमेरिया सभ्यता के काफी देवताओं की पूजा करते थे। जैसे अनु( आकाश का देवता), शमश( सूर्य), नन्न( चंद्रमा), बेल(पृथ्वी), निनगल( चंद्रमा की पत्नी) आदि।

वैसे देवताओं में एनलिल, इश्तर, और मार्डूक प्रमुख थे। ये सुमेर लोगों को भी देवता थे। देवी-देवताओं की पूजा पुजारी लोग करते थे जिन्हें पुरोहित भी कहा गया था। समाज में पुजारियों का वर्चस्व था।

बेबीलोन के लोग देवताओं की पूजा आर्थिक समृद्धि के लिए किया करते थे। उनमें भय की प्रवृत्ति अधिक थी। इसलिए वो लोग अंधविश्वासी और जादू-टोने जैसी क्रियाओं में भी लिप्त रहते थे।

बेबीलोन के लोग भविष्यवाणियों में विश्वास रखते थे। ये भविष्यवाणी पुजारी करते थे। ऐसे में फलित ज्योतिष का विकास तो हुआ लेकिन यह अंधविश्वास में तब्दील हो गया।

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ये लोग परलोक में विश्वास नहीं करते थे। उनका मानना था कि मृत्यु के बाद व्यक्ति को अंधेरी गुफा में जीवन बिताना होता है। इस बात का उल्लेख धार्मिक इतिहासकार तोकारेव के पुस्तक धर्म का इतिहास में विस्तार से मिलता है।

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