विविधता से भरे हमारे देश में देवी-देवताओं के मंदिरों में अलग-अलग ढंग से पूजा-अर्चना के कई उदाहरण मिलते हैं। ऐसा ही एक मंदिर है बिहार के खगड़िया में स्थित मां दुर्गा का मंदिर। जहां भक्त देवी मां को प्रसन्न करने के लिए गांजा और दूध चढ़ाते हैं।

यह दुर्गा मंदिर कोसी क्षेत्र के प्रमुख शक्तिपीठ में शामिल है। यहां देवी दुर्गा की कात्यायिनी स्वरूप में पूजा अर्चना की जाती है। यहा गांजा प्रसाद के रूप में चढ़ाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है।

हिंदू धर्म में भगवान शिव के मंदिरों में भांग, धतूरा और दूध चढ़ाने की प्रथा और उज्जैन के बाबा काल भैरव मंदिर में मदिरा सेवन की बात तो सुनने को मिलती रही हैं।

एक किंवदंती के अनुसार देवी सती की बायीं भुजा यहीं गिरी थी। कथा के अनुसार देवी सता के पिता राजा दक्ष ने यज्ञ किया। जिसमें भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया था। भगवान शिव ने इसे अपना अनादर माना और देवी सती को उक्त अनुष्ठान में जाने से मना कर दिया।

सती ने भगवान शिव के आदेश को अनसुना कर दिया और यज्ञ में शामिल होने चली गईं। बिना आमंत्रण के यहां आईं सती के इस कदम पर उपस्थित लोगों ने व्यंग्य किया। इससे आहत होकर मां सती यज्ञ में बने हवन कुंड में कूद पड़ी। इससे क्रोधित होकर भगवान शंकर तांडव करने लगे थे। इसी दौरान देवी की बायीं भुजा खगड़िया में गिरी।

कहते हैं कि श्रीपत महाराज नामक पशुपालक द्वारा मां की पूजा अर्चना की जाती थी। पशुपालकों की अधिकता के कारण यहां एक परंपरा बन गयी थी कि पशु का पहला दूध देवी को चढ़ाया जाएगा। पशुपालकों का विश्वास था कि दूध चढ़ाने से उनके दुधारू पशुओं पर कभी कोई बाधा नहीं आयेगी।

श्रीपत महाराज को गांजा बहुत प्रिय था और एक दिन जंगल में बाघ ने उसे शिकार बना लिया। यहीं से दूध के बाद गांजा चढ़ाने की परंपरा शुरू हो गयी।

श्रद्धालुओं के बीच लोकप्रियता को देखते हुए जनप्रतिनिधियों ने कई बार शक्तिपीठ को पर्यटनस्थल के रूप में विकसित करने की घोषणा की, लेकिन अभी तक इस मंदिर को अपना हक नहीं मिल पाया है।

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