स्वामी सुखबोधानंद

मैं जानवरों से प्रेम करता हूं। मेरे पास दो कुत्ते हैं और छह बिल्लियां हैं। मैंने कभी नहीं देखा कि वे कभी किसी बात की चिंता करते हों। हम मनुष्य जिस तरह से सोचते और महसूस करते हैं उसमें कुछ तो गड़बड़ी है। हममें से कोई भी यह नहीं मानता कि जीवन शानदार है बल्कि हम लोग और बेहतर की तलाश में लगातार भटकते ही रहते हैं। दुनियावी सफलता कभी भी संतुष्टि नहीं देती है और न ही भौतिक वस्तुएं व्यक्ति को सबकुछ होने का एहसास दे पाती हैं।

हम लोग या ज्यादातर लोग भौतिक वस्तुओं में अपने लिए राहत तलाशते हैं। हम बढ़िया कार, बढ़िया घर और सुख-सुविधाओं में ही अपने जीवन का अर्थ ढूंढते हैं। इसके बाद हम ज्यादा आनंद देने वाली गतिविधियों और ज्यादा रसूख वाली स्थिति में होना चाहते हैं। इस 'बेहतर' के चक्कर हमारा जीवनखोकर रह जाता है और वह 'बेकार' हो जाता है। तब हम जो भी करते हैं उसमें से आनंद चला जाता है। नीरसता हमारे जीवन को प्रदूषित करने लगती है। हमारे लिए अदृश्य सीमाएं खड़ी करने लगती है। तब आप कहने लगते हैं कि जब आपके पास फलां चीज होगी तभी आप खुश होंगे। दरसअल नीरस जीवन हमारे दिमाग की उपज है और यह हमारे भीतर की आवाज है। हम सभी चीजें पाना चाहते हैं, किसी खास स्थिति को पाना चाहते हैं और फिर खुशी देने वाली चीजों की तलाश में निकलना चाहते हैं। ऐसा कैसे संभव हो सकता है।

पहले व्यक्ति बाहरी दुनिया में सबकुछ खोजना चाहता है और फिर निराश होने पर अपने भीतर खोज में उतरता है। आखिर हर कोई अच्छा महसूस करना चाहता है। वह प्रेम और सुरक्षा चाहता है। वह सोचता है कि अगर मुझे मनचाहा प्रेम मिल जाएगा तो मैं अपने को सुरक्षित महसूस करूंगा। यह एक अलग तरह की खोज है। यह भी जीवन में क़डवाहट पैदा करती है।

प्रेम की तलाश में हम अपने सभी संबंधों की ओर देखते हैं और चाहते हैं कि आनंद की हमारी चाह पूरी हो, हमें सुरक्षा मिले। तब अगर गहराई में देखें तो हम दूसरों का उपयोग करने लगते हैं। यहां 'दूसरों' में पत्नी औरसहकर्मी शामिल हैं। ये सभी लोग हमारे आनंद के लिए जरूरी औजार बन जाते हैं। तब हम इन लोगों से जुड़ते नहीं बल्कि इनका उपयोग करने के बारे में सोचते हैं।

ऐसी अवस्था में दूसरों से जुड़ने के बजाय हम उनसे अलग हो जाते हैं। जिस तरह हम सोचते और बर्ताव करते हैं वैसा ही दूसरे भी सोचते हैं। वे भी हमारा उपयोग करने के बारे में सोचते हैं और इससे और भी ज्यादा अलगाव पैदा होता है। यही वजह है कि रिश्तों से किसी भी तरह का संतोष हमें प्राप्त नहीं होता है।

तब लोग अध्यात्म की ओर मुड़ते हैं लेकिन दूसरों से ही आनंद मिलने की उम्मीद यहां भी जारी रहती है। आखिकर जब हर तरफ से निराशा हाथ लगती है तब हमें सच्चे ज्ञान की प्राप्ति होती है। हमारी आंखें खुलती हैं। हालांकि किसी दूसरे से अपने लिए आनंद की खोज जारी ही रहती है।

कौन कहता है कि 'दूसरे' हमारी समस्या को हल करेंगे? हमारा ईगो। लेकिन हम इस बात को मान नहीं पाते हैं। हम ईगो के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर पाते हैं और इसलिए जीवन में समझदारी के लिए जगह नहीं रह जाती है। हमारे चैतन्य या जागरूक होने के बीच ईगो एक दीवार की तरह खड़ा रहता है।

किडनी, हृदय, लीवरऔर हमारे शरीर के सभी महत्वपूर्ण अंग अपने आप ही सुचारू रूप से अपना काम करते हैं और उनके बीच कहीं अहम नहीं आता है। जहां भी ईगो आता है वहां समझदारी का अभाव हो जाता है और फिर जीवन में निराशा उत्पन्ना होती है। हमें 'मैं' के भाव की जगह 'स्वीकार' का भाव रखना चाहिए और तब हमारे जीवन में सच्ची प्रसन्नाता और आनंद रहेगा। जीवन की इस दौड़ में अपने आप को जानना और अपने स्वभाव को जानना ही सबसे महत्वपूर्ण है। अपने आप को जानने का मतलब सबकुछ होने से नहीं बल्कि सचाई को स्वीकार करने से है। यह सच कि आप हर गतिविधि में श्रेष्ठ या प्रमुख नहीं हो सकते हैं आपको मुक्त होने में मदद करता है। जब इस स्पष्टता का अभाव होता है तो हम दुख उठाते हैं। हमारा जीवन विषादपूर्ण या दुखी नहीं होता है बल्कि हम ही अपने तौर-तरीकों से उसे बनाते हैं। इसलिए हमें बहुत सचेत होकर अपना रास्ता और तरीकों का चुनाव करना चाहिए।

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Posted By: Navodit Saktawat

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