महाभारत में एक कथा का उल्लेख मिलता है। यह बात उस समय की है जब द्रौपदी से पांडवों का विवाह हो चुका था। विवाह के बाद एक दिन देवर्षि नारद पांडवों से मिलने आए। उन्होंने पांडवों को बताया...

'प्राचीन समय में सुंद-उपसुंद नामक दो राक्षस भाई थे। उन्होंने अपने पराक्रम से देवताओं को भी जीत लिया था, लेकिन एक स्त्री के कारण दोनों में फूट पड़ गई और उन दोनों ने एक-दूसरे का वध कर दिया। ऐसी स्थिति तुम्हारे साथ न हो, ऐसा नियम बनाओ।'

तब पांडवों ने इस बात पर गौर किया और द्रौपदी के लिए एक नियम बनाया। नियम यह था कि, 'समय-समय पर हर एक भाई के पास द्रौपदी रहेगी।' जब एक भाई द्रौपदी के साथ एकांत में होगा तो वहां दूसरा भाई नहीं जाएगा।

यदि कोई भाई इस नियम का उल्लंघन करता है तो उसे ब्रह्मचारी होकर 12 साल तक वन में रहना होगा। हुआ यूं कि अर्जुन ने इस नियम को तोड़ दिया।जिसके कारण उन्हें 12 वर्ष वनवास जाना पड़ा था।

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वनवास के दौरान अर्जुन एक दिन अर्जुन सौभद्रतीर्थ में स्नान कर रहे थे तभी उनका पैर एक मगरमच्छ ने पकड़ लिया। अर्जुन, मगरमच्छ को उठाकर ऊपर ले आए। उसी समय वह मगरमच्छ एक सुंदर अप्सरा बन गई।

उसने अर्जुन को बताया कि, 'एक तपस्वी ने मुझे और मेरी सखियों को श्राप देकर मगर बना दिया था। अब आप मेरी सखियों का भी उद्धार कर दीजिए।' इस तरह अर्जुन ने उस अप्सरा की सखियों का भी उद्धार कर दिया।

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