मल्टीमीडिया डेस्क। शिव को संहार का देवता माना जाता है। यानी महादेव बुराइयों और पापों का नाश कर जगत कल्याण करते हैं। पृथ्वाीलोक पर शिव अनेकों जगह पर विराजमान है। कहीं पर देवाधिदेव स्वयंभू रूप में प्रकट हुए हैं तो कहीं पर वेदोक्त मंत्रों से उनकी लिंग रूप में प्राण प्रतिष्ठा की गई है। ऐसा ही एक पौराणिक मंदिर हिमालय की बर्फीली वादियों में स्थित केदारनाथ है, जहां शिव स्वयंभू रूप में प्रगट हुए हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में केदारनाथ की गणना की जाती है।

हिमालय में विराजमान है केदारनाथ

भगवान केदारनाथ के हिमालय में विराजमान होने की कथा भी बड़ी विचित्र है। महादेव का निवास हिमालय का कैलाश पर्वत माना जाता है। कैलाश पर्वत के बाद केदारनाथ को हिमालय में शिव का प्रमुख तीर्थ माना जाता है। मान्यता है कि केदारनाथ में शिव प्रतिमा और लिंग दोनों ही रूप में विराजमान नहीं है। तो आखिर इस पौराणिक तीर्थ में शिव किस रूप में विराजमान है? और अपने भक्तों को किस रूप में दर्शन देते हैं? इसके लिए सदियों पहले महाभारत काल में जाना होगा।

पांडव प्रायश्चित्त करने गए थे काशी

केदारनाथ कि कहानी महाभारत से शुरू होती है। मान्यता है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। प्रायश्चित्त करने से पहले पांडव महादेव का आशीर्वाद लेना चाहते थे, लेकिन शिवजी महाभारत युद्ध के कारण बहुत नाराज थे। पांडव जब शिवदर्शन के लिए काशी गए तो शिव काशी को छोड़कर हिमालय चले गए। पांचों पांडव भी महादेव के दर्शनों के लिए काशी से प्रस्थान कर गए और उनको खोजते- खोजते हिमालय पर्वत पर पहुंच गए। चूंकि महादेव पांडवों से नाराज थे और उनको दर्शन देना नहीं चाहते थे, इसलिए वह अंतर्ध्यान होकर केदार चले गए। पांडव भी उनके पीछ-पीछे केदार पहुंच गए।

भीम ने पहचाना था शिव को

पांडवों को पीछा करते देखकर भगवान शंकर ने बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं के दल में जा मिले। पांडवों को शिव के पशुओं के साथ में मिलने का संदेह हो गया था इसलिए भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ों पर पैर फैला दिए। पशुओं के दल में शामिल बाकी सारे पशु तो निकल गए, लेकिन बैल का रूप धारण किए शंकरजी भीम के पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए।

भीम ने तुरंत उनको पहचान लिया और उनको पकड़ने के लिए झपटे, शिव ने भीम की मंशा को भांप लिया और वह अंतर्ध्यान होने लगे। तभी भीम ने उनकी पीठ वाले हिस्से को पकड़ लिया। जब शिवजी ने पांडवों की श्रद्धा और अपार भक्ति को देखा तो वह प्रसन्न हुए और उन्होंने पांडवों को युद्ध के पापों से मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं।

केदारनाथ की एक कथा यह भी है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं।

Posted By: Yogendra Sharma