मल्टीमीडिया डेस्क। एक कुएं में गंगाधर नाम का मेंढकों का मुखिया रहता था। उसके परिवार में बारह सदस्य थे। मुखिया किसा तरह से अपने परिवार के लिए भोजन इकट्ठा करता था। भोजन की व्यवस्था करने के लिए उसको दूर-दूर तक जाना पड़ता था। एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे कुएं में वह भटकता रहता था। उसे पड़ोस में रहने वाले मेंढक बहुत दुष्ट प्रवृत्ति के थे और वह इस बात से परेशान था कि उसके पड़ोसी मेंढक उसके परिवार के मेंढकों के खाने को खा जाते हैं।

गंगाधर रिश्तेदारों और पड़ोसियों से क्षुब्ध होकर उनको ठिकाने लगाने की युक्ति सोचने लगा। एक दिन वह कुएं के बाहर इस बारे में सोच ही रहा था। तो उसको प्रियदर्शन नाम का काला सांप दिखाई दिया। मेंढक के मन में एक युक्ति सूझी। उसने सोचा क्यों न मैं सांप से मित्रता कर लूं। सांप की मित्रता से बहुत लाभ पहुंचेगा। कुछ ही दिनों में सांप और मेंढक में मित्रता हो गई और मेंढक गंगाधर ने अपनी जाति के विरोधियों का खात्मा करने की जिम्मेदारी उसको सौंप दी।

सांप प्रियदर्शन मेंढक गंगाधर से बोला कि 'मैं कुएं मैं जाने में असमर्थ हूं, जहां तुम अपने रिश्तेदारों के साथ रहते हो।' मेंढक गंगाधर ने कहा कि 'मैं तुम्हे रास्ता दिखलाते हुए अपने साथ ले चलूंगा।' तब क्या था मेंढक आगे- आगे और सांप पीछे- पीछे रेंगते हुए चल दिया।

गंगाधर ने अपने रिश्तेदारों के ठिकाने बताकर उनको सांप का ग्रास बनवा दिया। जब गंगाधर के सारे दुश्मन खत्म हो गए तब भी प्रियदर्शन की भूख नहीं मिटी। उसके बाद उसने गंगाधर और उसके परिवार का भी खात्मा कर दिया। इसलिए कहा जाता है कि दूसरों के लिए गड्ढा खोदने वाला एक दिन खुद उसमें गिर जाता है। बुराई को कभी भी बुराई से जीता नहीं जाता है।

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