योगेंद्र शर्मा। सनातन संस्कृति में संन्यासी को धर्म का रक्षक और ज्ञाता माना जाता है। साधुओं की घूमक्कड़ जिंदगी होने के बावजूद वह अनुशासित तरीके से जीवन बिताते हैं। संन्यासियों के अखाड़े में एक अखाड़ा ऐसा है जो सातों शैव अखाड़ों से दान में मिले साधुओं से बनाया जाता है। इस अखाड़े का नाम है गोदड़ अखाड़ा। गोदड़ अखाड़े के संन्यासियों का काम भी विशिष्ट होता है। इस अखाड़े के संत शैव अखाड़ों के देह त्याग चुके संतों को समाधि दिलाने का काम करते हैं।

कान से होती है अखाड़े के संतों की पहचान

गोदड़ अखाड़े के संतों की पहचान उनके कान से होती है। अखाड़े में शामिल होते ही संत को बाएं कान में भगवान शिव का कुंडल व दाएं कान में हिंगलाज माता की नथ पहनाई जाती है। जिस संत के गुरु जीवित होते हैं वह सोने के आभूषण (नथ व कुंडल) नहीं पहन सकता। सोने की नथ व कुंडल कान में होने का अर्थ है कि उस संत के गुरु की मृत्यु हो चुकी है।

गोदड़ अखाड़े की स्थापना ब्रह्मपुरी महाराज ने की थी। यह अखाड़ा शैव संप्रदाय के सातों अखाड़ों से संबंधित है। जहां भी शैव संप्रदाय के अखाड़े हैं, वहां गोदड़ अखाड़ा भी है। गोदड़ अखाड़े के संत शैव संप्रदाय के सातों अखाड़ों (अग्नि को छोड़कर) के मृतक साधुओं को समाधि (जमीन में दफनाना) दिलाते हैं। संतों के अंतिम संस्कार में भी गोदड़ अखाड़े की खास भूमिका होती है। शैव संप्रदाय के अखाड़ो में सिर्फ अग्नि में ही समाधि की परंपरा नहीं है।

जूनागढ़ है गोदड़ अखाड़े का केंद्र

इस अखाड़े में शिष्य अपने गुरु को विशेष तरीके से प्रणाम करता है। शिष्य पहले अपने गुरु के चरणों में बैठकर ऊंकार (कुछ विशेष मंत्र) बोलता है, उसके बाद अपने दोनों हाथों की उंगलियों से एक विशेष स्थिति में रख गुरु के सामने झुक कर प्रणाम करता है।

गोदड़ अखाड़े में इसकी स्थापना करने वाले ब्रह्मपुरीजी महाराज की चरण पादुका की पूजा करने की परंपरा है। जहां-जहां भी गोदड़ अखाड़े की शाखा है, वहां उनकी पादुका स्थापित है। इस अखाड़े का केंद्र जूनागढ़ (गुजरात) में है। मध्य प्रदेश में ओंकारेश्वर में भी इसकी शाखा है।

Posted By: