National Youth Day 2021: स्वामी विवेकानंद अपने गुरु की पत्नी शारदा को मां मानते थे। एक बार की बात है स्वामीजी विदेश यात्रा की तैयारी कर रहे थे। इससे ठीक पहले अलवर के महाराजा ने अपने बेटे के जन्मदिन पर उन्हें आमंत्रित किया। स्वामीजी अलवर गए। वहां कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। तभी उन्हें ख्याल आया कि मां शारदा से विदेश जाने की अनुमति तो ली ही नहीं। मां की अनुमति के बगैर यह काम कैसे होगा? यह विचार आते ही विवेकानंद सारे काम छोड़कर तुरंत जयराम वाटी (बंगाल) पहुंचे। वहां मां शारदा सब्जी साफ कर रही थीं। स्वामीजी मां के पास आते हैं और कहते हैं, 'मां विदेश जा रहा हूं। गुरुदेव का संदेश पूरी दुनिया में फैलाऊंगा।'

इस पर मां शारदा ने कहा, अच्छा जाओ, लेकिन वो वहां पड़ा चाकू मुझे दे जाओ। विवेकानंद चाकू उठाते हैं और धार वाला हिस्सा खुद पकड़ते हुए हत्थे वाला हिस्सा मां की ओर बढ़ाते हैं।

मां शारदा चाकू लेती हैं और कहती हैं, 'नरेंद्र अब तू जरूर विदेशों में जा सकता है, क्योंकि तेरी सोच ऐसी है कि तू कठिनाइयां स्वयं झेलता है और दूसरों के भले की सोचता है तो तू परमहंस देव का संदेश दुनिया में फैलाने में सफल होगा।' इसके बाद मां शारदा का आशीर्वाद लेकर विवेकानंद विदेशों में जाते हैं और भारते के ज्ञान को दुनिया में फैलाते हैं।

डाकू को भी बेटे समान मानती थीं मां शारदा

रामकृष्ण परमहंस के निधन के बाद मां शारदा ने बहुत गरीबी झेली। हालात बुरे थे, लेकिन वे ससुराल छोड़कर नहीं गईं। उन्हें अपने बच्चों के साथ ही आश्रम और वहां आए शिष्यों के भी पूरा ख्याल रखा। हालांकि बाद में आश्रम की दशा में सुधर गई।

आश्रम में रहते हुए वे अपने बच्चों और शिष्यों में कोई भेद नहीं करती थीं। यहां तक कि कभी-कभी आश्रम आने वालों से भी उनकी बड़ी आत्मियता थी।

ऐसा सिर्फ भारत में ही हो सकता है

कभी-कभी आश्रम आने वालों में एक डाकू अमजद भी था। वह अच्चाई के मार्ग पर चलने की कोशिश कर रहा था। लेकिन अमजद जब भी आश्रम आता था, मां शारदा की भतीजी उसे दूर से भोजन देती थी। यह देखकर मां शारदा को अच्छा नहीं लगता था।

एक दिन उन्होंने भतीजी से कहा, जैसे शशि मेरा बेटा है, वैसे ही अमजद भी मेरा बेटा है। उसके साथ यह भेदभाव अच्छा नहीं।

संकलन: अरविंद दुबे

Posted By: Arvind Dubey

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