शास्त्रों के अनुसार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश को मकर संक्रांति के पर्व के रूप में भारत में मनाया जाता है। इसी दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं और इस अवधि को देवताओं का दिन कहा जाता है। इसी तरह से दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा गया है। मकर संक्रांति का पर्व जीवन में नए उजाले की शुरुआत करता है। नवीन खुशियों का प्रारम्भ होता है। इंदौर के ज्योतिषाचार्य पंडित गिरीश व्यास बताते हैं कि इसी दिन स्नान, दान, तप, श्राद्ध, हवन तथा अनुष्ठान आदि करने का महत्व है। साथ ही साथ इस दिन कंबल और घी, गुड़, तिल आदि का दान देने का भी महत्व है। कहते हैं कि इस दिन दान देने से सम्पूर्ण मनोकामनाओं की पूर्ति, व्यापार में वृद्धि, संतान सुख एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस संबंध में शास्त्रों में कहा गया है-

माघे मासि महादेव यो दद्यात् घृतकम्बलम्।

स भुक्त्वा सकलान् भोगान् अन्ते मोक्षं च विन्दति।।

इसी प्रकार मनु भी दान की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है-

तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते।

द्वापरे यज्ञमेवाहुर दानमेकं च कलौयुगे।।

यानी सतयुग में तप, त्रेतायुग में ज्ञान द्वापर में यज्ञ और कलियुग में दान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

मकर संक्रांति पर स्नान का महत्व

मकर संक्रान्ति के दिन तीर्थराज प्रयाग, गंगासागर एवं गंगास्नान एवं गंगा तट पर दान की विशेष महिमा बताई गई है। भारतीय वांगमय में जीवन से जुडे प्रत्येक पहलु व ऋतु परिवर्तन को बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया जाता है। वैदिक ऋषियों ने तीन प्रकार से ऋतुओं को बांटा है जैसे-व्रत, पर्व, विवेक। मकर संक्रांति को भारत पर्व के रूप मनाता आ रहा है। उत्तर प्रदेश में इसे व्रत रूप में मनाया जाता है, जिसे यहां खिचड़ी कहते हैं। इसलिए इस दिन खिचड़ी खाने और खिचड़ी व तिल दान का भी विशेष महत्व है।

महाराष्ट्र में विवाहित स्त्रियां पहली संक्रांति पर तेल, कपास, नमक आदि वस्तुएं सौभाग्यवती स्त्रियों को प्रदान करती हैं। बंगाल में इस दिन स्नान कर तिल दान किया जाता है। दक्षिण भारत में इसे पोंगल के नाम से जाना जाता है। असम में आज के दिन बिहू का त्योहार मनाया जाता है। राजस्थान की प्रथा के अनुसार, इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां तिल के लड्डू, घेवर तथा मोतीचूर के लड्डू आदि पर रुपया रखकर वायन के रूप में अपनी सास को प्रणाम दान कर देती हैं तथा चौदह की संख्या में संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान करने का भी विधान है।

मकर संक्रान्ति का पर्व हमारे देश में विशेष महत्तव रखता है।

तुलसीदास जी भी कहते हैं- माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई।।

इसी दिन से ग्रीष्म के लिए पूर्व में ही हम हमारे शरीर को ग्रीष्म योग्य बनाने का कार्य करते हैं। अर्थात अब हमें गर्मी के लिए तैयार होते हैं, जिसके लिए तिल और गुड अर्थात गर्म वस्तुओं का प्रयोग करते हैं। जिससे ठंड में स्थित शरीर को ग्रीष्म योग्य बनाया जा सके। या यूं कहें कि अन्धकार से प्रकाश की और जाने का काल मकर संक्रान्ति कहलाता है।

मकर संक्रांति की पूजन विधि

मकर संक्रांति के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद एक लोटे में जल लेकर उसमें कंकुम, रक्तपुष्प लेकर सूर्य को अर्घ्य देने का विधान शास्त्रों में बताया गया है। इस दौरान ऊँ सूर्याय नमः मंत्र का जाप करना चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का भी महत्व बताया गया है। सूर्य को अर्घ्य देने के पश्चात भगवान विष्णु का पूजन तिल से करना चाहिए। जल में तिल मिलाकर भगवान का अभिषेक एवं तिल का भोग लगाना श्रेयष्कर माना जाता है।

विष्णु भजन, दान, तप तथा पीली वस्तुओं का दान भी बताया गया है। उसके बाद खिचड़ी का भोग बनाकर प्रभु को अर्पण कर सभी को खिचड़ी का प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। शाम को भजन कीर्तन एवं प्रभु का हवन, पूजन करने से प्रभु को प्रसन्न करना चाहिए। इस दिन विष्णुसहस्त्रनाम, आदित्यहृदयस्तोत्र एवं श्रीनारायण कवच का पाठ ब्राह्मण द्वारा कराकर यथोचित भोजन कराकर दान देना चाहिए, जिससे आने वाले वर्ष में हमारे परिवार में कोई भी दुख न मिले और सभी स्वस्थ हों ऐसी कामना करनी चाहिए।

Posted By: Arvind Dubey

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