डॉ. राकेश राय, कुंभनगर। दशनाम जूना अखाड़े के नागा साधुओं के बीच पंडालों की एक श्रृंखला न केवल कौतूहल पैदा कर रही है बल्कि सभी को अपनी ओर आकर्षित भी कर रही है। वजह है यहां महिला संन्यासियों की मौजूदगी।

दरअसल अखाड़े में महिलाओं को नागा बनाए जाने की कोई परंपरा नहीं है। महिलाएं वस्त्र धारण करती हैं और नागा की जगह अवधूतनी कही जाती हैं। लेकिन, इससे यह समझने की भूल नहीं करनी होगी कि अवधूतनी बनना आसान है। इसके लिए उन्हें संस्कारों की बेहद कठिन प्रक्रिया से गुजर कर रिश्तों का पिडदान करना होता है।

इसके पीछे उनका मकसद दत्तात्रेय भगवान की शरण में रहकर धर्म कल्याण के कार्य में अपनी भूमिका सुनिश्चित करनी है। अवधूतनी की दिनचर्या भी अखाड़े की पंरपरा के मुताबिक उसी तरह होती है, जैसी कि नागा साधुओं की। फर्क सिर्फ वस्त्र धारण करने को लेकर है। सुबह स्नान और फिर पूरे दिन अपने इष्ट का ध्यान।

जूना अखाड़े की महिला शाखा की अंतरराष्ट्रीय महंत आराधना गिरि अखाड़े में महिला संन्यासियों की स्थिति और दीक्षा की प्रक्रिया को और साफ करती हैं। बकौल अध्यक्ष अखाड़े की संन्यासी बनने के लिए महिलाओं को पहले गुरु के समक्ष संकल्प की प्रतिबद्धता सिद्ध करनी होती है। इसे सिद्ध करने में कई बार 10 से 12 बरस भी लग जाते हैं।

संन्यासी मुन्नी पुरी ने बताया कि अपने गुरु थानापति मुकुंदपुरी के सामने उन्हें खुद को सिद्ध करने में 12 वर्ष लग गए। क्या सभी को इतना ही वक्त लगता है? सवाल का जवाब इस बार एक बार फिर महंत आराधना की ओर से आया। बोलीं, कई बार एक-दो साल में भी गुरु सिद्धी मिल जाती है। ऐसी भी कई अवधूतनी हैं, जिन्हें खुद के संकल्प को साबित करने में महीने भर का वक्त भी नहीं लगा।

गुरु जब इस बात को लेकर आश्वस्त हो जाते हैं कि महिला अवधूतनी बनने के लिए तैयार है तो वह उसे पंच संस्कार की प्रक्रिया से गुजारते हैं। इसमें उन्हें गुरु की ओर से भभूत, भगवा, लगोट, चोटी और कंठी दी जाती है। सभी पंच संस्कार गुरु स्वरूप ही होते हैं। ऐसे में उन्हें भभूत गुरु, भगवा गुरु, लगोट गुरु, चोटी गुरु और कंठी गुरु भी नाम दिया गया है।

अवधूतनी के रूप में दीक्षित होने की अगली प्रक्रिया संस्कार की होती है, जिसमें रिश्तों का पिडदान कर दिया जाता है। 24 घंटे की यह प्रक्रिया संपन्न होने के बाद गुरु अवधूतनी को दंड-कमंडल देते हैं। दंड-कमंडल हासिल होते ही अवधूतनी का ओहदा हासिल हो जाता है।

संस्कार हमेशा कुंभ में ही संपन्न किया जाता है। युवा अवधूतनी महंत पूजा पुरी बताती हैं कि रिश्तों से त्याग के लिए ही संस्कार प्रक्रिया में कफन का इस्तेमाल किया जाता है। महंत आराधना गिरि बताती हैं कि पहले तो महिला अवधूतनी की संख्या कम थी लेकिन, अब काफी हैं। इस बार कुंभ के महिला अखाड़े में करीब 150 अवधूतनी मौजूद हैं।

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