मल्टीमीडिया डेस्क। चतुर्दशी तिथि को सामान्यत: रिक्ता तिथि होने की वजह से शुभ कार्यों में वर्जित माना जाता है, लेकिन भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि का पौराणिक और शास्त्रोक्त महत्व है। इस मास में आने वाली चतुर्दशी तिथि को अनन्त चतुर्दशी कहा जाता है। अग्नि पुराण में इस चतुर्दशी तिथि का महत्व, कथा और पूजा विधान बताया गया है।

चतुर्दशी तिथि देवादिदेव महादेव को समर्पित है। इस तिथि के देवता भगवान शिव है। इस तिथि की गणना रिक्ता तिथियों में की जाती है। इसलिए शुभ कार्यों में इस तिथि का त्याग किया जाता है यानी इस दिन शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं। इस तिथि को क्रूरा भी कहा जाता है और इसकी दिशा पश्चिम है।

अनन्त चतुर्दशी की कथा

एक दिन भगवान श्रीकृष्ण से ज्येष्ठ पांडव सम्राट युधिष्ठिर मिलने के लिए आए। सम्राट युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से अपने दुखों के बारे में विस्तार से बताया और इन दुखों के निवारण का उपाय पूछा। तब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि तुम विधि-विधान से अनन्त चतुर्दशी के दिन भगवान अनन्त की पूजा करो। इससे तुम्हारे सभी दुखों का निवारण हो जाएगा। सारे संकट दूर हो जाएंगे और साथ ही तुम्हारा खोया राज्य भी वापस मिल जाएगा। इसके बाद श्रीकृष्ण ने सम्राट युधिष्ठिर को अनन्त चतुर्दशी की व्रत कथा सुनाई।

प्राचीन काल में सुमन्त नाम का एक नेक तपस्वी और तेजस्वी ब्राह्मण था। विद्वान ब्राह्मण की एक सुंदर, धर्मपरायण पुत्री थी। ब्राह्मण पुत्री का नाम सुशीला था। सुशीला जब बड़ी हुई तो उसकी माता दीक्षा का स्वर्गवास हो गया। पत्नी का देहवसान होने के बाद ब्राह्मण सुमन्त ने कर्कशा नामक महिला से दूसरा विवाह कर लिया। सुमन्त ने सुशीला का विवाह कौडिन्य ऋषि के साथ कर दिया। विदाई में सुशीला को कुछ उपहार देने की जब बात आई तो कर्कशा ने दामाद को कुछ ईंटें और पत्थरों के टुकड़े बांधकर दे दिए।

ऋषि कौडिन्य दुखी होकर अपनी पत्नी के साथ अपने आश्रम की ओर चल दिए, लेकिन रास्ते में ही रात हो गई और वे नदी तट पर सन्ध्या करने लगे। सुशीला ने देखा की नदी के तट पर बहुत-सी स्त्रियाँ सुंदर वस्त्र और आभूषण धारण कर किसी देवता की पूजा पर रही थीं। सुशीला के पूछने पर उन महिलाओं ने विधिपूर्वक अनन्त व्रत की महत्ता बताई। सुशीला ने वहीं नदी के तट पर उस व्रत का अनुष्ठान किया और चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में बांधकर ऋषि कौडिन्य के पास आ गई।

कौडिन्य ने सुशीला से डोरे के बारे में पूछा तो उसने व्रत से संबंधित सारी बात बता दी। ऋषि कौडिन्य ने डोरे को तोड़कर आग में डाल दिया इससे भगवान अनन्त का अपमान हुआ। इस वजह से ऋषि कौडिन्य दुख और संताप में रहने लगे। उनकी सारी धन- सम्पत्ति नष्ट हो गई। इस दरिद्रता की वजह जब उन्होंने अपनी पत्नी से पूछी तो सुशीला ने अनन्त भगवान का डोरा जलाने की बात कहीं।ऋषि कौडिन्य पश्चाताप करते हुए अनन्त डोरे को वापस प्राप्त करने के लिए वन में चले गए। ऋषि कई दिनों तक वन में भटकते-भटकते निराश होकर एक दिन धरती पर गिर पड़े।

ऋषि कौडिन्य की दयनीय हालत देखकर अनन्त भगवान प्रकट होकर बोले- 'हे कौडिन्य! तुमने मेरा तिरस्कार किया था, इसलिए तुमको इतना कष्ट भोगना पड़ा। तुमको दुखों का सामना करना पड़ा और अब तुमने अपने कर्मों का पश्चाताप किया है। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। अब तुम घर जाकर विधि- विधान से अनन्त चतुर्दशी का व्रत करो। चौदह साल तक यह व्रत करने से तुम्हारा दु:ख स्वत: ही दूर हो जाएगा। तुम धन-धान्य से सम्पन्न हो जाओगे।' कौडिन्य ने वापस आश्रम में आकर वैसा ही किया और उनको सारे दुखों से मुक्ति मिल गई। श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर ने भी अनन्त भगवान का व्रत किया, जिसके प्रभाव से पाण्डव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए और उनका वंश लंबे समय तक राज करता रहा।