मल्टीमीडिया डेस्क। सूर्य देवता की आराधना का पर्व छठ का प्रारंभ गुरुवार को नहाय खाय के साथ हो गया। इस सूर्य देव और छठी मैया की आराधना प्रारंभ होती है। पौराणिक मान्यता है कि अंगदेश के राजा दानवीर कर्ण सूर्यदेव के बड़े भक्त थे और घंटो सूर्य आराधना में बिताते थे। अंगदेश वर्तमान में बिहार के भागलपुर वाला इलाका है। भागलपुर और इसके आसपास के इलाकों से शुरू हुई छठ पूजा ने अब विश्वव्यापी रूप ले लिया है।

नहाय खाय के बाद होता है खरना

कार्तिक शुक्ल छठ से प्रारंभ हुआ छठ महोत्सव चार दिनों तक चलता है। इसके पहला दिन नहाय खाय का होता है। इसके बाद दूसरे दिन खरना किया जाता है। खरना का अर्थ लोकसंस्कृति में शुद्धिकरण होता है। छठ का व्रत रखने वाले व्रती नहाय खाय के दिन एक समय भोजन ग्रहण कर अपने शरीर और मन का शुद्धिकरण करते हैं। शुद्धिकरण की पूर्णता अगले दिन की जाती है। इसलिए इसको खरना कहते हैं। इस दिन व्रत करने वाले गुड़ से बनी खीर का नैवेद्य कुलदेवता, सूर्यदेव और छठी मैया को समर्पित करते हैं। इस बार खरना एक नवंबर को किया जाएगा।

देवी-देवता को चढ़ाई जाने वाली खीर को व्रती अपने हाथों से शुद्ध होने के बाद तैयार करते हैं। गुड़ से बनी खीर को मिट्टी से बने चूल्हे पर तैयार किया जाता है। खीर में आरवा चावल या साठी का चावल इस्तेमाल किया जाता है। ईंधन के रूप में आम की लकड़ी का प्रयोग सर्वोत्तम माना जाता है। नहीं तो दूसरे वृक्ष की लकड़ी भी इस्तेमाल कर सकते हैं। खरना पूजन के बाद व्रत करने वाले स्वयं प्रसाद ग्रहण करते हैं उसके बाद परिवार के दूसरे सदस्य इसको लेते हैं। खरना पूजन में एक बार भोजन ग्रहण करने के बाद व्रती दिनभर निराहार रहते हैं। शाम और सुबह का अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का परायण कर सकते हैं। खरना के बाद व्रती सख्त नियमों का पालन करते हैं। ब्रह्मचर्य का पालन करने के साथ जमीन पर शयन करते हैं और इसको लिए स्वच्छ बिस्तर का इस्तेमाल करते हैं।

Posted By: Yogendra Sharma

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