रीवा से श्याम मिश्रा। मध्य प्रदेश के सतना जिले के चित्रकूट का भगवान श्रीराम से गहरा संबंध माना जाता है। मान्यता है कि श्रीराम अपने वनवास के दौरान यहां से गुजरे और रहे। श्रीराम ने यहां रहकर इस भूमि को एक तरह से स्वर्ग बना दिया। इतिहासकारों व शास्त्रों की मानें तो चित्रकूट स्थित श्रीराम से जुड़े प्रतीकों के कारण इस जगह की देश-दुनिया में अलग पहचान है। वर्ष 2018 में दो राजनीतिक दलों ने चित्रकूट में राम वन पथ गमन बनाने की बात करके इसे सुर्खियों में ला दिया था। राम वन गमन पथ पर शोध करने वाले डॉ. राम अवतार के मुताबिक अयोध्या से लेकर श्रीलंका तक करीब 200 स्थानों पर श्रीराम से जुड़ी हुई स्मृतियां मिलती हैं लेकिन भारत में अब तक किए गए शोध में कुल 17 स्थान पर श्रीराम से जुड़े इतिहास की जानकारी और प्रतीक चिह्न प्राप्त होते हैं।

चित्रकूट की धार्मिक आस्था का यह आलम है कि आज भी लोग भगवान श्रीराम की छाया को न केवल महसूस करते हैं बल्कि उनका मानना है यहां पांच दिन तक रुककर दर्शन करने से पापों से मुक्ति मिल जाती है। मान्यता है कि वनवास के दौरान श्रीराम कामदगिरि पर्वत पर रहते थे। इसी स्थान पर भरत मिलाप मंदिर भी स्थित है, जहां पर भरत ने श्रीराम से कहा था कि वे अयोध्या वापस लौट चलें। यहां श्रद्धालु इस विश्वास से परिक्रमा करते हैं कि श्रीराम उनकी भक्ति से खुश होकर उनकी मनोकामना अवश्य पूरी करेंगे।

भरत कूप और राम शैय्या : चित्रकूट से करीब पांच किमी की दूरी पर भरत कूप नाम का पुराना कुआं है। बताया जाता है कि भरत श्रीराम का राज्याभिषेक करने के लिए जल यहीं से लेकर गए थे। यहां भरत का मंदिर भी है। भरत कूप और सीतामार्ग के बीच रामशैय्या नाम की जगह है। कहा जाता है कि श्रीराम और सीता ने यहां एक रात विश्राम किया था। श्रीराम ने दोनों के बीच धनुष रखकर पृथक रहने की मर्यादा निभाई थी। श्रीराम के भाई भरत ने इस स्थान पर पवित्र जल का कुंड बनाकर रखा था। जहां विभिन्ना तीर्थस्थलों से लाया गया पवित्र जल एकत्रित कर रखा जाता है। जानकी कुंड यहां के रामघाट पर स्थित भव्य स्थान है। कहा जाता है कि सीताजी इस नदी में नहाया करती थीं। यहां की हरियाली भी दर्शनीय है।

पांच दिन में पूरे होते हैं यहां के दर्शन

चित्रकूट में कई सुंदर स्थान हैं। इन सभी तीर्थों के दर्शन पांच दिन में पूरे करने का विधान माना जाता है। पहले दिन सीतापुर से राघव प्रयाग में स्नान, कामदगिरी की परिक्रमा और अन्य तीर्थों तक पहुंचने के लिए 11 किमी का मार्ग तय किया जाता है। दूसरे दिन राघवपुर से कोटि तीर्थ, सीता रसोई, हनुमान धारा होकर 20 किमी का रास्ता तय करके वापस सीतापुर आया जाता है। तीसरे दिन राघव प्रयाग से केशवगढ़, प्रमोद वन, जानकी कुंड, सिरसा वन, स्फटिक शिला और अनुसुइया आश्रम होते हुए बाबूपुर पहुंचा जाता है। चौथे दिन बाबूपुर से गुप्त- गोदावरी में स्नान के बाद कैलाश दर्शन होते हुए चौबेपुर रुकने की मान्यता है। आखिरी दिन चौबेपुर से भरत कूप में स्नान करके राम शैय्या होते हुए सीतापुर लौटते हैं।

पहाड़ी पर लक्ष्मण देते थे पहरा

यहां चरण-पादुका नाम की जगह के पास एक पहाड़ी है, जिसे लक्ष्मण पहाड़ी कहा जाता है। मान्यता है कि यह जगह लक्ष्मण जी की सबसे प्रिय जगहों में से एक थी। यहीं बैठकर वे रात में पहरा दिया करते थे।

सीता रसोई और हनुमान धारा

सीतापुर की पूर्व दिशा में संकर्षण पर्वत है, जिस पर कोटि तीर्थ है। यहीं पर हनुमान धारा मंदिर है, जिसकी धारा हनुमान कुंड में गिरती है। इस जगह से लगभग 100 सीढ़ियां चढ़ने पर सीता रसोई नाम की जगह आती है। इसके आसपास बांके सिद्ध, पंपासर, सरस्वती झरना, यमतीर्थ, सिद्धाश्रम, जटायु तपोभूमि है।

Posted By: Prashant Pandey

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