मल्टीमीडिया डेस्क। मानव जीवन में सुख-दुख, सफलता-असफलता और अमीरी-गरीबी का चक्र हमेशा चलता रहता है। हर इंसान की कामना होती होती है कि उसको इस जीवन में सभी सुखों की प्राप्ति हो और अंत में मोक्ष प्राप्त हो। इसलिए वह देवी-देवता की आराधना करता है। दिपावली को सनातन संस्कृति का सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है। दिपावली के पांच दिनों में धन के साथ सुख-समृद्धि की कामना के लिए उपासना की जाती है। श्रीयंत्र एक ऐसा ही धनदायक यंत्र है, जिसकी पूजा से विपुल धन की प्राप्ति होती है। शास्त्रोक्त मान्यता है कि श्रीयंत्र की आराधना से अक्षय लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और सुख-शांति के साथ धन-धान्य और सौभाग्य प्राप्त होता है।

श्रीयंत्र का निर्माण देवगुरु बृहस्पति ने करवाया था

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार महालक्ष्मी नाराज होकर बैकुण्ठ को चली गईं, इस कारण पृथ्वी तल पर काफी समस्याएं पैदा हो गईं। ब्राह्मण और वणिक बिना लक्ष्मी के दीन-हीन और असहाय हो गए। तब महर्षि वशिष्ठ ने निश्चय किया कि वो लक्ष्मी को प्रसन्न कर भूतल पर ले आएंगे।

जब महर्षि वशिष्ठ बैकुण्ठलोक में जा कर लक्ष्मी से मिले तो उनको पता चला कि लक्ष्मी नाराज हैं और वह पृथ्वी पर आने को तैयार नहीं हैं, तब महर्षि वशिष्ठ वहीं पर बैठ कर भगवान विष्णु की आराधना करने लगे। जब विष्णु प्रसन्न होकर प्रकट हुए तो वशिष्ठ ने कहा, हम पृथ्वी पर बिना लक्ष्मी के बहुत दुखी हैं, हमारे आश्रम उजड़ चुके हैं। और धरती का वैभव लगभग समाप्त हो चुका है। महर्षि वशिष्ठ की विनती पर भगवान विष्णु, वशिष्ठ को साथ लेकर लक्ष्मी के पास गए और उनसे पृथ्वी पर चलने का अनुरोध किया। परन्तु लक्ष्मी नहीं मानीं और उन्होंने कहा कि मैं किसी भी परिस्थ्ति में वापस जाने को तैयार नहीं हूं। क्योंकि पृथ्वी पर साधना और शुद्धि बिल्कुल नहीं है।

महर्षि वशिष्ठ निराश होकर धरती पर लौट आए और लक्ष्मी के निर्णय को सबको बताया। इस समस्या से सभी चिंतित थे और समस्या का समाधान निकालने में लगे हुए थे। उस समय देवगुरु बृहस्पति ने कहा कि अब सिर्फ एक ही उपाय बचा है, 'श्रीयंत्र साधना' । उन्होंने कहा कि यदि सिद्ध 'श्री यंत्र' बना कर विधिपूर्वक स्थापित किया जाए, तो निश्चय ही लक्ष्मी को पृथ्वी पर आना पड़ेगा।

देवगुरु बृहस्पति के निर्देश पर ॠषियों ने धातु पर श्रीयंत्र का निर्माण किया और उस यंत्र को मंत्रोच्चार से सिद्ध कर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा की। धनतेरस को श्रीयंत्र को स्थापित कर विधि-विधान से उसका षोडशोपचार पूजन किया गया। पूजन समाप्त होने के कुश समय पहले देवी लक्ष्मी स्वयं वहां उपस्थित हुई और बोली कि मैं धरती पर किसी भी स्थिति में यहां आने के लिए तैयार नहीं थी, किंतु बृहस्पति की इस कार्य के कारण मुझे आना ही पड़ा। श्रीयंत्र मेरा आधार है और इसी में मेरी आत्मा निहित है।

Posted By: Yogendra Sharma