मल्टीमीडिया डेस्क। भगवान भोलेनाथ औघरदानी है, नीलकंठ है, देवों के देव हैं और अजन्मे, निराकार स्वरूप में ब्रह्माण्ड को कण-कण में विराजमान है। हिमालय के कैलाशपर्वत पर उनका वास है और धरती पर काशी उनकी प्रिय नगरी है।

सदुपायकथास्वपण्डितो हृदये दु:खशरेण खण्डित:।

शशिखण्डमण्डनं शरणं यामि शरण्यमीरम् ॥

हे शम्भो! मेरा हृदय दु:ख रूपीबाण से पीड़ित है, और मैं इस दु:ख को दूर करने वाले किसी उत्तम उपाय को भी नहीं जानता हूँ अतएव चन्द्रकला व शिखण्ड मयूरपिच्छ का आभूषण बनाने वाले, शरणागत के रक्षक परमेश्वर आपकी शरण में हूँ। अर्थात् आप ही मुझे इस भयंकर संसार के दु:ख से दूर करें।

शिव पूजा का पूरे साल विधान है और लिंग पुराण के अनुसार हर माह में विभिन्न तरीकों से पूजा करने पर मानव को उसे अभिष्ट फल की प्राप्ति होती है। आषाड़ के महीने में जो रात्रि में खांड, घी, सत्तू, गौरस का भोजन करने के साथ श्रोत्रीय ब्राह्मणों को भोजन कराता है और गौरवर्ण की गाय का दान करता है वह वरुणलोक का वासी बनता है।

श्रावण में शिवपूजन कर जो रात्रि में दूध, चावल का भोजन करता है, पूर्णिमा को घी से पूजा करके श्रौत्रीय ब्राह्मण को भोजन करवाता है वह वायु के सामिप्य को प्राप्त करता है।

भाद्रपद मे जो रात्रि में भोजन करता है और वृक्ष के मूल में स्थित हवन के शेष भाग का हवन करता है, ब्राह्मण को भोजन करवाता है, नीले कंधे वाले गाय और बैल का दान करता है वह यक्षलोक में यक्षों का राजा बनता है।

आश्विनी मास में महादेव का पूजन कर ब्राह्मण को भोजन करवाता है और नीले रंग के गाय-बैल का दान करता है उसको ईशानलोक की प्राप्ति होती है।

कार्तिक मास में खीर और भात का भोजन करके जो शिवपूजन करता है, ब्राह्मणों को भोजन करवाकर कपिला गाय का दान करेगा, उसको सूर्यलोक की प्राप्ति होती है।

मार्गशीर्ष के महीने में रात्रि का भोजन करता है और जौ, घी, दूध का सेवन कर उपवास करता है, दरिद्र और ब्राह्मणों को भोजन करवाता है। वह सोमलोक में सोम के साथ आनंद करता है।