डॉ. निखिलेश शास्त्री

दक्षिण भारत में सुबेल पर्वत पर स्थित सुवर्ण निर्मित अति संपन्न लंकानगरी को दैत्यों ने अपने शौर्य और पराक्रम से बसाया था। इस नगरी की संपन्नता से लालायित देवताओं ने आक्रमण कर लंका को अपने अधिकार में ले लिया और इन देवताओं ने कुबेर को लंका का राजा बना दिया। देवताओं से भयभीत ये दैत्य परिवार सहित पाताल लोक में जा पहुंचे। वहां ब्राह्मण कुल के महर्षि पुलस्त्य ने इन दैत्यों को अपने आश्रम में शरण दी। पुलस्त्य ऋषि का पुत्र विश्रवा दैत्यों के साथ आई कन्या कैकसी पर मोहित हो गया। फलस्वरूप कैकसी ने तीन पुत्र रावण, कुंभकर्ण और विभिषण और एक पुत्री शूर्पणखा को जन्म दिया।

इस तरह आर्य जाति के ब्राह्मण पिता विश्रवा और अनार्य जाति की राक्षसी माता कैकसी का पुत्र रावण तेजस्वी और तपस्वी वर्णसंकर पुत्र था। कालांतर में रावण ने सशक्त सैन्य बल एकत्र करके देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया और अपने पूर्वजों की लंकानगरी पर पुन: अपना आधिपत्य प्राप्त कर लिया। साथ ही कुबेर का पुष्पक विमान भी हस्तगत कर लिया। पाताल लोक में रहते हुए रावण ने अपने पिता से वेदों और शास्त्र-आगम-पुराण आदि का पूरा ज्ञान प्राप्त कर लिया, साथ ङी उसने आर्य जाति में प्रचलित धार्मिक क्रियाओं और संस्कारों को भी आत्मसात किया।

ज्योतिष, नृत्य, संगीत, चित्रकला, युद्धकला में भी रावण पारंगत था। रावण ने अपने कौशल और साहस से वैभवपूर्ण विशाल साम्राज्य स्थापित किया। आदि कवि वाल्मीकि ने रामायण में रावण के ऐसे उदात्त चरित्र को मानवीय गुणों से संपन्न चित्रित किया था। यद्यपि रावण अनार्य राक्षस जाति का था, तथापि वह आर्य संस्कारों से पूर्ण सुसंस्कृत था। इसलिए वाल्मीकि ने राम की तरह रावण को भी एक ऐतिहासिक महापुरुष माना है।

रावण के ऐसे उदात्त गुणों से अभिभूत जैन धर्मावलंबियों ने भी श्रीकृष्ण के समान रावण को भी तीर्थंकर की श्रेणी में स्थापित किया है, वहीं बौद्ध धर्म के महायानियों ने भी रावण को महासत्व बोधिसत्व से अलंकृत किया है। रावण में राक्षसत्व के तत्व होने के कारण उसका शरीर कृष्ण वर्ण का था और शरीर लंबा-चौड़ा। जब हनुमान ने अंतपुर में काले विशाल दैत्याकार शरीर वाले रावण को शय्या पर सोते देखा तो डर गए थे। जबकि स्वंय हनुमान ने सिंहासन पर दिव्य वस्त्र-अलंकारों से सुसज्जित रावण को सिंहासन पर बैठे देखकर उसके भव्य व्यक्तित्व की प्रशंसा की थी। रावण के ऐसे आकर्षण स्वरूप की वाल्मीकि ने कामदेव से तुलना की थी।

वस्तुत : वाल्मीकि ने सुंदरकांड में राक्षसराज रावण के ऐश्वर्य, पराक्रम और उसकी यशोकीर्ति की प्रशंसा की है। रावण द्वारा बनाई गई लंकानगरी सुवर्ण से बनी हुई थी। लंका के गगनचुंबी महल, पुष्पक विमान, बहुमूल्य वस्त्र अलंकारों से सुसज्जित लंका के प्रजाजन ये सभी रावण के अतुल ऐश्वर्य को प्रदर्शित करते हैं। साथ ही रावण की राजनीतिक शक्ति भी इतनी प्रबल थी कि उसने अपने पराक्रम से कई राज्यों को पराजित कर अपने साम्राज्य को चारों ओर विस्तृत कर लिया था। इस प्रकार रावण उत्कृष्ट गुणों से परिपूर्ण अतिविद्वान, सुसंस्कृत, शूरवीर, कूटनीतिक बुद्धि से परिपूर्ण, विविध कलाओं में प्रवीण, कुशल प्रशासक महापुरुष था।

वाल्मीकि ने जैसे रावण के चरित्र को उभारा है, उसी प्रकार रावण के राक्षस जाति होने के कारण राक्षस समाज और संस्कृति का भी वर्णन किया जाता है। रामायण के संदर्भों से स्पष्ट है कि राक्षस जाति मातृ-प्रधान सत्ता थी इसलिए रावण राक्षस संस्कृति का पोषक और संरक्षक था। लंकानगरी की संपन्नाता के वर्णन से वहां के प्रजाजन कितने सुखी और संपन्न थे इसकी झलका दिखाई देती है।

सुवर्ण से बनी पूरी लंकानगरी, वहां के सुंदर भव्य गगनचुंबी महल, नृत्य, संगीत, चित्रकारी आदि ललित कलाओं से मनोरंजन, वहां के क्रीड़ागृह राजसी बाग-बगीचे, नाना बहुमूल्य अलंकारों से सजी सुंदर महिलाएं ये सभी प्रमाण हैं कि राक्षस जंगली और बर्बर नहीं थे बल्कि एक सुसंस्कृत राक्षस जाति थी।

इसीलिए जब हनुमान ने लंका की भव्यता देखी तो ऐसा लगा मानों वे स्वर्गलोक में आ गए हों।

राक्षस जाति का उद्देश्य 'खाओ-पीयो और मौज करो' था, इसलिए राक्षस समाज में मदिरा और सुंदरियों के उपभोग की प्रधानता थी, ये राक्षस के कन्या के पिता को धन देकर ले आते थे और ऐसे न देने पर वे कन्या के परिजनों की हत्या तक कर उनसे स्त्रियां छीन लेते थे। राक्षस जाति में विवाह का यह भी एक प्रकार था।

राक्षसों में आर्यों जैसी धार्मिक क्रियाएं भी थीं। वे यज्ञ करते, शिवलिंग का पूजन करते। आर्यों की तरह कन्यादान रीति से विविह करते, मंदोदरी का विवाह इसी प्रकार हुआ था। ऐसे ही अंत्येष्टि क्रिया भी करते। श्रीराम ने विभीणष को रावण की अंत्येष्टि करने का आदेश दिया था। रावण के राज्य में समस्त राक्षस जाति सुख-समृद्धि से संपन्न और पूरी तरह से सुसंस्कृत थीं।

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