सिख धर्म में प्रकाश पर्व का विशेष स्थान है। भारत में सिर्फ सिख धर्मावलंबी ही नहीं, अन्य धर्मों के लोग भी प्रकाश पर्व को उत्साह के साथ मनाते हैं। दरअसल सिखों के 10वें धर्मगुरु गुरु गोबिंद सिंह की जयंती को प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाता है। गुरु गोविंद सिंह जी को एक महान स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ एक अच्छे कवि भी थे। गुरु गोबिंद सिंह के त्याग और वीरता की आज तक मिसाल दी जाती है। साथ ही उनकी बहादुरी के किस्सों से इतिहास की किताबें भरी पड़ी हैं। गुरु गोबिंद सिंह जी की जयंती 20 जनवरी को है।

ऐसे मनाया जाता है प्रकाश पर्व

सिख धर्म के लोग इस दिन गुरुद्वारों को सजाते हैं और अरदास, भजन, कीर्तन के साथ लोग गुरुद्वारे में मत्था टेकने जाते हैं। गुरु गोविंद सिंह जी के लिए यह शब्द इस्तेमाल किया जाता है कि 'सवा लाख से एक लड़ांऊ?' इसका मतलब है कि शक्ति और वीरता के संदर्भ में उनका एक सिख सवा लाख लोगों के बराबर है।

गौरतलब है कि गुरु गोविंद सिंह जी सिखों के 10वें धर्मगुरु थे। उनका जन्म माता गुजरी जी तथा पिता श्री तेगबहादुर जी के घर हुआ था। जब गुरु गोबिंद का जन्म हुआ था, उस समय पिता गुरु तेगबहादुर जी बंगाल में थे। उन्हीं के वचनानुसार बालक का नाम गोविंद राय रखा गया और सन् 1699 को बैसाखी वाले दिन गुरुजी पंज प्यारों से अमृत छककर गोविंद राय से गुरु गोविंद सिंह जी बन गए।

गुरु गोबिंद सिंह ने की थी खालसा पंथ की स्थापना

गुरु गोविंद सिंह जी एक महान योद्धा, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक व्यक्तित्व वाले थे। उन्होंने ही साल 1699 में 13 अप्रैल बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की, जो सिख धर्म के इतिहास की सबसे ऐतिहासिक घटना है। खालसा यानि खालिस (शुद्ध) जो मन, वचन एवं कर्म से शुद्ध हो और समाज के प्रति पूरी तरह से समर्पण का भाव रखता हो। सिख समुदाय की एक सभा में एक बार गुरु गोबिंद सिंह ने सबसे पूछा था कि कौन अपने सिर का बलिदान देना चाहता है?

उसी समय एक स्वयंसेवक इस बात के लिए राजी हो गया और गुरु गोविंद सिंह उसे दूसरे तंबू में ले गए और कुछ देर बाद एक खून लगी हुई तलवार के साथ। कुछ देर बाद गुरु गोबिंद सिंह ने जब फिर वही सवाल दोबारा उस भीड़ के लोगों से पूछा और उसी प्रकार एक और व्यक्ति राजी हुआ और उनके साथ गया।

फिर वह खून से सनी तलवार लेकर बाहर आए, इसी प्रकार जब पांचवा स्वयंसेवक उनके साथ तंबू के भीतर गया तो कुछ देर बाद गुरु गोविंद सिंह सभी जीवित सेवकों के साथ वापस सभा में लौटे और उन्होंने सभी पांच स्वयंसेवकों को पंज प्यारे या पहले खालसा का नाम दिया और इसी के साथ खालसा पंथ की स्थापना हो गई।

Posted By: Sandeep Chourey

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