मल्टीमीडिया डेस्क। सनातन संस्कृति में गुरु की महिमा का काफी महिमामंडन किया है। शास्त्रों में कहा गया है कि गुरु के बगैर ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है। किसी शुभ काम की शुरुआत करने के लिए गुरु की सलाह और उनके आशीर्वाद का काफी गुणगान किया गया है। साथ ही मानव जीवन में गुरु के मार्गदर्शन में चलने के महत्व को भी बताया गया है। धर्मशास्त्रों में गुरु के बताए रास्तों पर चलकर इंसान ने साधारण मानव से महामानव तक का सफर तय किया है, वहीं देवताओं ने भी गुरु के सानिध्य में जगत कल्याण किया है।

इस बार गुरु पूर्णिमा 16 जुलाई मंगलवार को है। सनातन संस्कृति में आषाढ़ मास की पूर्णिमा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के अवतार महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। इसलिए इस दिन को गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। शास्त्रों में गुरु को देवी-देवताओं से ऊंचा दर्जा दिया गया है क्योंकि गुरु के बताए मार्ग पर चलने से और गुरु की दी गई शिक्षाओं के पालन करने से व्यक्ति को भगवान की आराधना का फल मिलता है। इसलिए कहा गया है कि

गुरुब्र्रह्मा गुरुर्विष्णु र्गुरुर्देवो महेश्वर:।

गुरु: साक्षात्परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नम:।।

गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं।

गुरु शब्द में है अंधकार और प्रकाश का महत्व

गुरु की पूजा से परब्रह्म की प्राप्ति होती है। ज्ञान की प्राप्ति होती है और जीवन के सार से साक्षात्कार होता है। इसलिए धर्मशास्त्रों में गुरु-शिष्य परंपरा की विशेष महत्ता बताई गई है। शास्त्रों के अनुसार 'गुरु' शब्द में उसका महत्व छिपा हुआ है। 'गु' शब्द का अर्थ है अंधकार और 'रु' शब्द का अर्थ है प्रकाश। यानी गुरु मानव को अंधकार से प्रकाश की और ले जाते हैं। अपने शिष्य के जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं और अपने शिष्य के सफल जीवन के लिए उचित मार्गदर्शन करते हैं। महर्षि वेदव्यास ने भविष्योत्तर पुराण में गुरु पूर्णिमा के बारे वर्णन किया है कि

मम जन्मदिने सम्यक् पूजनीय: प्रयत्नत:।

आषाढ़ शुक्ल पक्षेतु पूर्णिमायां गुरौ तथा।।

पूजनीयो विशेषण वस्त्राभरणधेनुभि:।

फलपुष्पादिना सम्यगरत्नकांचन भोजनै:।।

दक्षिणाभि: सुपुष्टाभिर्मत्स्वरूप प्रपूजयेत।

एवं कृते त्वया विप्र मत्स्वरूपस्य दर्शनम्।।

आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को मेरा जन्म दिवस है। इस दिन को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन पूरी आस्था के साथ गुरु को कपड़े, आभूषण, गाय, फल, फूल, रत्न, धन आदि समर्पित कर उनका पूजन करना चाहिए। ऐसा करने से गुरुदेव में मेरे ही स्वरूप के दर्शन होते हैं।

ऐसे करें गुरु की पूजा

गुरु पूर्णिमा के दिन लोग अपने-अपने गुरुओं का पूजन करते हैं। गुरु यदि ब्रह्मलीन हो गए हैं तो उनकी चरणपादुका या उनके चित्र का पूजन किया जाता है। इसके लिए गुरु के आश्रम में जाकर पूजा कर सकते हैं यदि घर के बाहर दूसरी जगह या दूसरे शहर नहीं जा सकते तो घर पर एक चौकी पर गुरु के चित्र की कुमकुम, अबीर, गुलाल, अक्षत आदि से पूजा कर सकते हैं। इसके लिए किसी विद्वान पंडित की मदद भी ले सकते हैं। यदि गुरु की चरण पादुका हैं तो उनकी पूजा करना बेहतर रहेगा।

गुरु के सम्मुख शिष्य को यह काम नहीं करना चाहिए

- शिष्य को कभी भी गुरु के समान आसन पर नहीं बैठना चाहिए। इससे गुरु का अपमान होता है। गुरु आसन पर बैठे हो तो उनसे नीचे स्थान पर शिष्य को बैठना चाहिए। यदि गुरु जमीन पर बैठे हों तो शिष्य भी जमीन पर स्थान ग्रहण कर सकते हैं।

- शास्त्रों में गुरु के सामने दीवार या अन्य किसी सहारे से टिक कर बैठने का भी निषेध किया गया है। साथ ही गुरु के सामने पैर फैला कर बैठना भी वर्जित है।

- गुरु के सामने मर्यादा का पालन करना चाहिए। अश्लील या वर्जित शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

- जब भी गुरु से मिलने जाए कभी खाली हाथ न जाएं. उनके लिए कुछ न कुछ उपहार अवश्य लेकर जाएं। यही उपहार उनके लिए गुरु दक्षिणा के समान होता है।