Hanuman Janmotsav 2020: जब भी कभी भक्तों के मन में पवनसुत हनुमान का नाम आता है तो उनकी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की भक्ति का स्मरण जरूर होता है। बजरंगबली भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त थे और प्रभु की भक्ति में अपना सर्वस्व उन्होंने न्यौछावर कर दिया था। श्रीराम भी हनुमानजी को अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा मानते थे और उनके बगैर किसी काम की कल्पना नहीं करते थे। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि श्रीराम और महाबली हनुमान की पहली मुलाकात कैसे हुई थी और कैसे यह रिश्ता मजबूत बंधन में बंधते हुए प्रगाढ़ होता चला गया। ऐसे श्रीराम भक्त हनुमान का प्रगटोत्सव 8 अप्रैल को मनाया जाएगा।

पंचवटी में थी श्रीराम की कुटिया

महाबली हनुमान और श्राीराम की पहली भेट कब और कैसे हुई थी इसका वर्णन सनातन संस्कृति के धर्मग्रंथों में दिया गया है। शास्त्रोक्त कथा के अनुसार भगवान श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास हुआ था। इस दौरान वह पंचवटी में, जो इस वक्त महाराष्ट्र में नासिक के पास स्थित है, वहां पर कुटिया बनाकर रह रहे थे। उसी समय लंकापति रावण देवी सीता का अपहरण कर उनको लंका ले गया। श्रीराम और भाई लक्ष्मण को इस बात का पता नहीं था सीता कहां पर है। दोनों हताश और निराश होकर घने जंगलों की खाक छान रहे थे।

सीताहरण और उनकी खोज के दौरान कई घटनाओं की धरती साक्षी रही। देवी सीता को खोजने के लिए श्रीराम जंगलों की खाक छान रहे थे, वहीं किष्किंधा के दो वानरराज भाई बाली और सुग्रीव के बीच महासंग्राम चल रहा था। बाली बलशाली था इसलिए उससे बचने के लिए सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत की एक गुफा में छिप गए। इस क्षेत्र में ही अंजनी पर्वत पर हनुमान के पिता का भी राज था, जहां हनुमानजी निवास करते थे। ऋष्यमूक पर्वत वानरों की राजधानी किष्किंधा के नजदीक स्थित था। गुफा में सुग्रीव अपने मंत्रियों और विश्वस्त वानरों के साथ रहता था। तभी श्रीराम और लक्ष्मण सीता की खोज करते हुए इस पर्वत पर पहुंच गए।

श्रीराम- लक्ष्मण को देख सुग्रीव हुए भयभीत

गुफा में छिपे सुग्रीव ने जब श्रीराम और लक्ष्मण की झलक देखी तो वे भयभीत हो गए। उन्होंने इससे पहले इतने तेजस्वी और बलशाली मानव नहीं देखे थे। सुग्रीव तुरंत दौड़ते हुए हनुमान के पास गए और बोले हम सभी की जान को खतरा है। सुग्रीव को लगा कि बाली ने उनको मारने के लिए इन दोनों के भेजा है। सुग्रीव ने हनुमानजी से कहा कि तुम ब्रह्मचारी का रूप धारण कर उन दोनें तेजस्वी पुरुषों के पास जाओ और उनके दिल की बात जानकर मुझे इशारे से बतलाना। यदि दोनों बलशाली पुरुष बाली द्वारा भेजे गए हो तो मैं इस जगह को तुरंत छोड़ दूंगा।

सुग्रीव की मुसीबत को देखकर हनुमानजी ब्राह्मण का वेश धारण कर दोनों के पास गए और श्रीराम और लक्ष्मण को शीश नवाकर उनसे कहा , ' वीर! सांवले और गोरे वर्ण के शरीर वाले आप दोनों कौन हैं, जो क्षत्रिय के रूप में वन में विचरण कर रहे हैं? हे स्वामी! कठोर भूमि पर कोमल चरणों से पदयात्रा करने वाले आप किस कारण वन में विचरण कर रहे हैं? हनुमान ने आगे कहा- मन को हरण करने वाले आप दोनों के सुंदर, कोमल अंग हैं और आप वन की विषम परिस्थितियों में धूप और वायु को सहन कर रहे हैं। क्या आप ब्रह्मा, विष्णु, महेश- इन तीन देवताओं में से कोई हैं या आप दोनों नर और नारायण का रूप हैं?'

श्रीराम ने दिया हनुमान को परिचय

श्रीरामचंद्रजी ने हनुमानजी को अपना परिचय दिया और कहा- हम कोशलराज महाराज दशरथ के पुत्र हैं और पिता के वचनों का पालन करने के लिए वन आए हैं। हमारे नाम राम और लक्ष्मण हैं और हम दोनों भाई हैं। हमारे साथ सुशील, गुणी स्त्री सीता थी। जंगल में एक राक्षस ने मेरी पत्नी सीता का हरण कर लिया है। इसलिए हम उसे ही खोजते फिर रहे हैं। हमने तो आपको अपने संबंध में सभी जानकारी दे दी हैअब हे ब्राह्मण! आप अपने बारे में बताइए।

श्रीराम के चरणों में गिरे हनुमान

अपने प्रभु को पहचानते ही हनुमानजी उनके चरणों में गिर गए और उनकी स्तुति करने लगे। बजरंगबली को बहुत खुशी हुई और उन्होंने कहा कि में आपको तपस्वी के वेष में पहचान नही सका। मैं वानर बुद्धि का प्राणी हूं। मैने तो आपको अज्ञान की वजह से नहीं पहचाना, लेकिन आप तो अंतरयामी हैं। आप कैसे पूछ रहे हैं? अपने हदय के उदगार प्रकट करने के बाद हनुमानजी अपने असली रूप में आ गए। श्रीराम ने तुरंत अपने भक्त को चरणों में से उठाकर गले लगा लिया। श्रीरान ने कहा कि भक्त हनुमान आप मुझे लक्ष्मण से भी ज्यादा प्रिय हैं। क्योंकि मुझे सेवक ज्यादा प्रिय है। इस तरह श्रीराम और हनुमान जन्म-जन्मांतर के स्नेह के रिश्तों में हमेशा के लिए बंध गए।

ऐसा था किष्किंधा राज्य

अब हम बात किष्किंधा राज्य की करते हैं। इस राज्य में बहने वाली प्रमुख नदी तुंगभद्रा नदी है। यह दक्षिण भारत की प्रमुख पवित्र नदियों में से एक है। तुंगभद्रा कर्नाटक और आंध्रप्रदेश में बहती हुई छत्तीसगढ़ में रायपुर के निकट कृष्णा नदी में मिल जाती है। इस नदी का नाम तुंगा और भद्रा नदियों के मिलन से हुआ है। इसका उदगम गंगामूल नामक जगह पर है, जो श्रृंगगिरि या वराह पर्वत के अंतर्गत आता है। जिस जगह पर तुंगभद्रा नदी धनुष की आकृति में बहती है। उस जगह पर ऋष्यमूक पर्वत है और उसी से मील भर दूर किष्किंधा का क्षेत्र प्रारंभ होता है।

Posted By: Yogendra Sharma

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