मल्टीमीडिया डेस्क। रिद्धी-सिद्धी के दाता श्रीगणेश को प्रथम पूजनीय कहा जाता है, क्योंकि किसी भी शुभ कार्य में पहले श्रीगणेश की स्थापना और पूजा का विधान है। भक्तगण पूरे साल श्रीगणेश की आराधना करते हैं, लेकिन बुधवार और चतुर्थी तिथि को गणपति की पूजा का विशेष महत्व है। इसमें भादो मास की गणेश चतुर्थी विशेष फलदायी मानी जाती है। इस दिन से दस दिवसीय गणेशोत्सव की शुरूआत होती है।

गणेश चतुर्थी की कथा

पौरैणिक मान्यता के अनुसार , एक बार माता पार्वती स्नान करने से पहले चंदन का उबटन अपने शरीर पर लगा रही थीं। इस उबटन से ही उन्होंने भगवान गणेश का निर्माण किया और घर के दरवाजे के बाहर सुरक्षा के लिए श्रीगणेश को बैठा दिया। गणपतिजी को सुरक्षा में तैनात कर माता पार्वती स्नान करने चली गई। उसी समय भगवान शिव वहां पर पहुंचे तो भगवान गणेश ने उनको घर के बाहर ही रोक दिया।

श्रीगणेश के रोकने से भगवान शिव क्रोधित हो गए और उन्होंने गणेशजी का सिर धड़ से अलग कर दिया। माता पार्वती को जब गणेशजी का सिर कटने का पता चला तो वह बहुत दुखी हुईं। पार्वती के दुखी होने पर भगवान शिव ने उनको वचन दिया कि वह गणेश को जीवित कर देंगे। भगवान शिव ने अपने गणों को आदेश दिया कि गणेश का सिर कहीं से भी ढूंढ़ कर लाएं।

गणों को जब ढूंढने पर भी बालक का सिर नहीं मिला तो वे एक हाथी के बच्चे का सिर लेकर आए और गणेश भगवान को लगा दिया। इस प्रकार मान्यता है कि हाथी के सिर के साथ भगवान गणेश का पुनर्जन्म हुआ। शास्त्रोक्त मान्यता के अनुसार यह घटना चतुर्थी के दिन ही हुई थी। इसलिए इस दिन को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। गणेशजी का जन्म भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को स्वाति नक्षत्र और सिंह लग्न में हुआ था।

गणेश चतुर्थी का महत्व

इस दिन गणेशजी की मिट्टी की प्रतिमा की विधि-विधान से पूजा की जाती है। शुभमुहूर्त में श्रीगणेश प्रतिमा की स्थापना की जाती है और शास्त्रोक्त तरीके से चंदन, रोली, अबीर, गुलाल, सिंदूर, हल्दी, मेंहदी और वस्त्र समर्पित कर उनकी पूजा की जाती है। श्रीगणेश को मोदक, लड्डू, पंचामृत, पंचमेवे, गुड़-घी और पान, सुपारी का भोग लगाया जाता है। जनेऊ पहनाई जाती है। श्रीगणेश को दुर्वा, लाल फूल अतिप्रिय है। इसलिए विशेष तौर पर उनको ये दोनों अर्पित किए जाते हैं।

मान्यता है कि भादो मास की गणेश चतुर्थी को श्रीगणेश की आराधना करने से मानव के सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। कष्टों का नाश होता है और जो फल सामान्य दिनों में श्रीगणेश की पूजा - उपासना से मिलता है उससे अनन्त गुना फल सिर्फ गणेश चतुर्थी को श्रीगणेश की पूजा करने से मिल जाता है।