मल्टीमीडिया डेस्क। जगन्नाथ मंदिर कई बार आक्रमणकारियों के आक्रमण का शिकार हुआ। आक्रमण कर हमलावरों ने इसका विध्वंस किया या इस मंदिर को भारी क्षति पहुंचाई, लेकिन इसके बावजूद पुरी के इस विश्वप्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर को सनातन संस्कृति को मानने वाले राजा-महाराजाओं ने फिर से भव्य स्वरूप प्रदान किया। मंदिर को कई बार हमलावरों की हिंसा का शिकार होना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद मंदिर के धार्मिक महत्व, भक्तों की आस्था, उसमें समाए चमत्कार और मंदिर से जुड़ी मान्यताओं में कोई फर्क नहीं पड़ा।

1340 में हुआ था पहला हमला

मंदिर पर हमले और विध्वंस का पहला उल्लेख सन 1340 में मिलता है, जब बंगाल के सुल्तान इलियास शाह ने जगन्नाथ मंदिर पर हमला कर इसको नष्ट कर दिया था। उस वक्त ओडिशा, उत्कल प्रदेश के नाम से जाना जाता था। उस समय पराजित होने से पहले उत्कल सम्राट नरसिंह देव तृतीय ने सुल्तान इलियास शाह से मंदिर और प्रजा की रक्षा के लिए युद्ध किया था। इलियास शाह के सैनिकों ने मंदिर परिसर में काफी खूनखराबा किया था, लेकिन इसके बावजूद सम्राट नरसिंह देव जगन्नाथ की मूर्तियों को बचाने में कामयाब रहे थे, क्योंकि उनके आदेश पर मूर्तियों को छुपा दिया गया था।

फिरोज शाह तुगलक ने किया था 1360 में हमला

मंदिर पर दूसरा हमला 1360 में दिल्ली सल्तनत के सुल्तान फिरोज शाह तुगलक ने किया था। इस हमले में भी मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा था। जगन्नाथ मंदिर पर तीसरा हमला 1509 में बंगाल के सुल्तान अलाउद्दीन हुसैन शाह के सेनापति इस्माइल गाजी ने किया था। आक्रमण की सूचना मिलते ही मंदिर के पुजारियों ने मूर्तियों को मंदिर से दूर ले जाकर बंगाल की खाड़ी में स्थित चिल्का झील के एक द्वीप में छुपा दिया था। उस समय के ओडिशा के सूर्यवंशी राजा प्रताप रुद्रदेव ने सुल्तान की सेना को हुगली में पराजित कर दिया था।

अफगान काला पहाड़ ने किया था 1568 में हमला

1568 में मंदिर पर चौथा भयानक हमला किया गया था। काला पहाड़ नाम के अफगान हमलावर ने मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा था। इस हमले के समय भी मूर्तियों को चिल्का झील में स्थित द्वीप में छुपा दिया गया था। इस हमले के बाद ओडिशा में मुस्लिम शासन स्थापित हो गया था। मंदिर पर पांचवा हमला 1592 में ओडिशा के सुल्तान ईशा के बेटे उस्मान और कुथू खान के बेटे सुलेमान ने किया था। इन्होंने भक्तों को बेरहमी से मारा, मूर्तियों को अपवित्र किया और मंदिर की बेशुमार संपदा को लूट लिया था।

हाशिम खान ने किया मंदिर पर सातवां हमला

1601 में बंगाल के नवाब इस्लाम खान के सेनापति मिर्जा खुर्रम ने जगन्नाथ मंदिर पर छठा हमला किया था। इस समय भगवान की मूर्तियों को पुजारियों ने नाव के जरिए भार्गवी नदी को पारकर कपिलेश्वर में छुपा दिया था। इसके बाद मूर्तियों को दूसरी जगह भी ले जाया गया था। मंदिर पर सातवां हमला ओडिशा के सूबेदार हाशिम खान ने किया था और मंदिर को काफी नुकसान पहुचाया था। इस बार भी हमले की सूचना मिलते ही मूर्तियों को 50 किलोमीटर दूर स्थित खुर्दा के गोपाल मंदिर में छुपा दिया गया था। मूर्तियों को वापस 1608 में जगन्नाथ मंदिर में स्थापित किया गया था।

टोडरमल के बेटे राजा कल्याणमल ने किया था 1611 में हमला

मंदिर पर आठवां हमला हाशिम खान की सेना के एक हिंदू जागीरदार ने किया था। इस वक्त मंदिर में मूर्तियां मौजूद नहीं थी इसलिए मंदिर को लूटने के बाद उसको किले में तब्दील कर दिया गया था। मंदिर पर नौवां हमला 1611 में मुगल बादशाह अकबर के नवरत्नों में शुमार राजा टोडरमल के बेटे राजा कल्याणमल ने किया था। इस समय पुजारियों ने मूर्तियों को बंगाल की खाड़ी में स्थित एक द्वीप में छुपा दिया था। मंदिर पर दसवां हमला भी राजा कल्याणमल ने कर मंदिर को काफी लूटा था।

मंदिर पर 11वां हमला 1617 में मुगल सम्राट जहांगीर के सेनापति मुकर्रम खान ने किया था। इस समय गोबापदार नामक जगह पर छुपा दिया गया था। 12वां हमला 1621 में ओडिशा के मुगल गवर्नर मिर्जा अहमद बेग ने किया था। मुगल सम्राट शाहजहां के दौरे के वक्त भी मंदिर की मूर्तियों को छुपा दिया गया था। मंदिर पर 13वां हमला 1641 में ओडिशा के मुगल सूबेदार मिर्जा मक्की ने किया था। मंदिर पर 14वां हमला भी मिर्जा मक्की ने ही किया था। जगन्नाथ मंदिर पर 15वां हमला अमीर फतेह खान ने किया था और उसने मंदिर के रत्नभंडार को लूट लिया।

औरंगजेब के आदेश पर हुआ था 1692 में हमला

मंदिर पर 16वां हमला मुगल सम्राट औरंगजेब के आदेश पर 1692 में किया गया था। औरंगजेब ने मंदिर को पूरी तरह ध्वस्त करने का फरमान जारी किया था। उस वक्त ओडिशा का नवाब इकराम खान था, जो मुगलों के अधीन था। उसने औरंगजेब के हुकुम की तामील करते हुए जगन्नाथ मंदिर पर हमला कर भगवान का सोने के मुकुट लूट लिया था। मंदिर की मुर्तियों को आक्रमणकारियों से बचाने के श्रीमंदिर नामक स्थान के बिमला मंदिर में छुपाया गया था। 17वां हमला 1699 में मुहम्मद तकी खान ने किया था। इस समय भी मूर्तियों को छुपाया गया था और एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानातरित करते हुए कुछ समय के लिए हैदराबाद भी ले जाया गया था।

इस तरह से हमलावरों के नापाक इरादों को नाकाम करने के लिए 144 साल तक भगवान जगन्नाथ मंदिर के बाहर रहे।

योगेंद्र शर्मा

Posted By: Yogendra Sharma