मल्टीमीडिया डेस्क। भारतभूमि को त्यौहारों और पर्वों की भूमि कहा जाता है। भारतवर्ष में कई व्रत-त्यौहारों को मनाया जाता है और इन सभी के पीछे देव उपासना के साथ प्रकृति का आराधना का भाव छिपा होता है। पर्वों और व्रतों के जरिए अपने घर-परिवार के सुखी जीवन के साथ प्रकृति का आभार व्यक्त किया जाता है। वर्ष में ऐसे कई व्रत आते हैं जो घर-परिवार को समर्पित होते हैं। ऐसा ही एक व्रत करवा चतुर्थी का है। जिसके भारतवर्ष खासकर उत्तर भारत में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन पत्नी अपने पति की लंबी और सुखद जिंदगी की कामना करती है।

करवा चतुर्थी का व्रत सुहागन स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु और सौभाग्यवृद्धि के लिए करती है। यह पर्व खासकर पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में मनाया जाता है। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि यानी व्यापिनी चतुर्थी करवा चौथ के नाम से जानी जाती है। सुहागन स्त्रियां इस व्रत को 12 से लकर 16 वर्ष तक लगातार हर साल करती है। उसके बाद इस व्रत के उद्यापन किया जा सकता है। यदि महिलाएं चाहे तो आजीवन इस व्रत को रख सकती है। अखंड सौभाग्य की कामना के लिए इससे बढ़कर कोई व्रत नहीं है।

करवा चौथ व्रत कथा

प्राचीन काल में इन्द्रप्रस्थपुर राज्य के एक शहर में वेदशर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वेदशर्मा की पत्नी का नाम लीलावती था और उसके सात पुत्र और एक पुत्री थी। पुत्री का नाम वीरावती था और वह अत्यंत गुणवान थी। सात भाइयों के बीच इकलौती बहन होने से माता-पिता और भाईयों की भी वह काफी लाड़ली थी। विवाह की उम्र होने पर वीरावती का विवाह एक उच्चकुल के ब्राह्मण युवक से हुआ। शादी के पश्चात वीरावती एक समय जब अपने माता-पिता के यहाँ पर थी तब उसने अपनी भाभियों के साथ पति की लम्बी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा। करवा चौथ के कठोर व्रत के दौरान वह भूख सहन नहीं कर सकी और कमजोरी के कारण बेहोश होकर गिर गई।

ऐसे समय भाईयों से भी उसकी दयनीय हालत देखी नहीं जा रही थी। वे जानते थे वीरावती एक पतिव्रता नारी है और चन्द्रदर्शन किये बिना वह खाने को छुएगी भी नहीं। चाहे इससे उसके प्राण ही क्यों न निकल जाए। इसलिए सभी भाइयों ने मिलकर एक योजना बनाई, जिससे बहन भोजन ग्रहण कर ले। उनमें से एक भाई कुछ दूरी पर वटवृक्ष पर हाथ में छलनी और दीपक लेकर चढ़ गया। जब वीरावती होश में आई तो सभी भाईयों ने उससे कहा कि चन्द्रोदय हो गया है और वह छत पर जाकर चन्द्रमा के दर्शन कर लें। वीरावती ने भाई के हाथ की छलनी का पूजन कर भोजन ग्रहण करने लगी। भोजन शुरू करते ही उसको अशुभ संकेत मिलना शुरू हो गए। पहले कौर में उसे बाल मिला, दुसरें में उसे छींक आई और तीसरे कौर में उसको अपने ससुराल वालों को बुलावा आ गया। पहली बार जब वहअपने ससुराल पहुँची तो वहां पर उसको अपने पति का मृत शरीर मिला।

वीरावती पति के मृत शरीर को देखकर विलाप करने लगी और व्रत के दौरान अपनी किसी भूल के लिए खुद को दोषी ठहराने लगी। ऐसे समय इंद्रदेव की पत्नी देवी इन्द्राणी वीरावती को सान्त्वना देने के लिए गई। वीरावती देवी इन्द्राणी से अपने पति को जीवित करने की विनती करने लगी। तब देवी इन्द्राणी ने वीरावती को बताया कि उसने चन्द्रमा को अर्घ्य दिए बिना ही व्रत को तोड़ा था इसलिए उसको यह दुख मिला है।

देवी इन्द्राणी ने वीरावती को करवा चौथ के व्रत के साथ-साथ पूरे साल में हर महीने की चतुर्थी को व्रत करने की सलाह दी और कहा कि ऐसा करने से उसका पति जीवित हो जाएगा। वीरावती ने देवी इन्द्राणी की सलाह पर ऐसा ही किया और उसका मृत पति जीवित होकर उसके पास वापस लौट आया।

Posted By: Yogendra Sharma