मल्टीमीडिया डेस्क। चतुर्थी तिथि को गणेशजी की आराधना की जाती है और इस दिन चांद को रात्रि में उदय होने पर अर्घ्य दिया जाता है और उसकी विधि-विधान से पूजा की जाती है। महीने में दो बार चतुर्थी तिथि आती है। एक शुक्ल पक्ष की और दूसरी कृष्ण पक्ष की। दोनों तिथियों पर प्रथम पूज्यनीय श्रीगणेश और चंद्रदेव की आराधना का विधान है। चतुर्थी तिथि विनायक चतुथी, संकष्टी चतुर्थी, तिल चतुर्थी, गणेश चतुर्थी के नाम से जानी जाती है। जिनका हर मास में अलग-अलग महत्व होता है।

महिलाओं के लिए करवा चौथ का विशेष महत्व है। इस दिन देश-विदेश में हिंदू महिलाएं करवा चौथ का व्रत रखती है और रात को चंद्रोदय के बाद चांद को अर्घ्य देकर इसको खोलती है। करवा चौथ को देश के अलग-अलग हिस्सों अलग अलग तरीकों से मनाया जाता है। बदलते दौर के साथ इसको मनाने के तौर-तरीकों में भी काफी अंतर आया है। वर्तमान में करवा चौथ काफी बड़े पैमाने पर मनाया जाता है।

मध्य प्रदेश की यदि हम बात करें तो इस पर्व को सामान्य चतुर्थी के पर्व की तरह मनाया जाता है। इसमें सबसे पहले सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर देव आराधना की जाती है। रात होने पर चतुर्थी तिथि की पूजा का विधान है। इसलिए रात को स्नान के बाद स्वच्छ कपड़े पहनकर पूजा स्थल पर आसन ग्रहण किय जाता है। एक पाट पर लाल कपड़ा बिछाकर उसके ऊपर श्रीगणेश और देवी पार्वती की प्रतिमा की स्थापना कि जाती है। साथ में एक मिट्टी के करवे में जल भरकर पूजास्थल पर रखा जाता है।

श्रीगणेश, देवी पार्वती और उनके साथ में करवे की पूजा की जाती है। सबसे पहले कुमकुम, अबीर, गुलाल, हल्दी मेंहदी, फूल और वस्त्र समर्पित किए जाते हैं। शुद्ध घी का दीपक और धूपबत्ती जलाई जाती है। लड्डू, मोदक, मिष्ठान्न, पंचमेवा, पंचामृत, ऋतुफल, आदि का भोग लगाया जाता है। देवी- देवताओं की आरती उतारी जाती है और उसके बाद यदि चांद उदय हो गया तो उसको कुमकुम, अबीर, गुलाल, हल्दी मेंहदी, फूल और वस्त्र समर्पित किए जाते हैं, नहीं तो चंद्रोदय का इंतजार किया जाता है। इसके बाद करवे का पानी पीकर महिलाएं अपना व्रत खोलती है।

Posted By: Yogendra Sharma