उज्जैन। रविवार 13 अक्टूबर को आश्विन मास की पूर्णिमा है, जिसे शरद पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। कहते हैं कि इस रात को चंद्रमा अमृत बरसाते हैं और आयुर्वेद में भी इस रात का विशेष महत्व बताया है। शरद पूर्णिमा की रात चंद्र अपनी पूरी 16 कलाओं के साथ उदय होता है। इसलिए कुछ असाध्य रोगों में विशेष प्रकार की औषधि इसी समय में दी जाती है। शरद पूर्णिमा के संबंध में मान्यता है कि रात में देवी लक्ष्मी पृथ्वी का भ्रमण करती हैं और भक्तों से पूछती हैं कौन जाग रहा है। जो जाग रहा होता है, उसके घर में लक्ष्मी जी का प्रवेश हो जाता है, इसीलिए इसे कोजागरी पूर्णिमा भी कहते हैं। लक्ष्मीजी की कृपा प्राप्त करनी है, तो आज के दिन अपनी वाणी पर विशेष ध्यान दें।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवी रुक्मिणी ने महालक्ष्मी से पूछा कि हे देवी आप किस तरह के मनुष्यों पर कृपा करती हैं। देवी लक्ष्मी ने उत्तर दिया कि जो मनुष्य अपनी वाणी पर नियंत्रण रखता है और जरूरत के अनुसार उचित शब्दों का ही प्रयोग करता है उस पर मैं प्रसन्न रहती हूं। ऐसा मनुष्य मेरी कृपा का पात्र होता है। इसके अलावा क्रोध न करने वाले, आलस न करने वाले और गरीबों की सहायता करने वाले पर मैं प्रसन्न होती हूं।

देवी लक्ष्मी, भगवान विष्णु और उनके अवतारों की पूजा के लिए ये तिथि बहुत खास है। इस दिन भगवान सत्यनारायण की कथा भी की जाती है। वैसे इस समय गोचर में मीन राशि में भ्रमण कर रहे चंद्रमा पर कन्या राशि में बैठे मंगल की सातवीं दृष्टि पड़ने से लक्ष्मी योग और चंद्रमा पर वश्चिक राशि में भ्रमण कर रहे गुरु की पांचवीं दृष्टि पड़ने से गजकेसरी योग का निर्माण हो रहा है।

मान्यता है कि द्वापर युग में इस तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों संग रास रचाया था। वृंदावन के निधिवन के संबंध में कहा जाता है कि आज भी यहां श्रीकृष्ण और गोपियां रास रचाती हैं।

Posted By: Shashank Shekhar Bajpai