योगेंद्र शर्मा। भारत के धर्मशास्त्रों में प्रेम को काफी सहज, सरल और समर्पित रूप पेश किया गया है। शारीरिक सुख से ज्यादा इसको मन की भावना से जोड़ा है और इसका सात्विक स्वरूप जनमानस के सामने पेश किया है। ठंड की विदाई के समय वसंत ऋतु का आगमन होने पर मदन उत्सव मनाने की परंपरा है। जो सनातन संस्कृति में प्यार के इजहार और रिश्तों में मधुरता लाने के लिए जाना जाता है।

वसंतोत्सव का प्रारंभ माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी यानी वसंत पंचमी से होता है। यह मौसम के गर्म दिनों की शुरुआत का भी दिन है। वसंत पंचमी का उत्सव मदनोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। यह उत्सव श्रीकृष्ण और कामदेव को समर्पित है।

कामशास्त्र में ‘सुवसंतक’ नामक उत्सव का उल्लेख मिलता है। ‘सरस्वती कंठाभरण’ में कहा गया है कि वसंतावतार के दिवस को सुवसंतक कहते हैं। यानी वसंत का इस दिन पृथ्वी पर अवतरण माना जाता है। ‘मात्स्यसूक्त’ और ‘हरी भक्ति विलास’ में भी वसंत का प्रारंभ भी इसी दिन से माना जाता है। इस उत्सव को रंगों का पर्व भी माना जाता है इसलिए इस उत्सव को अंतिम दिन रंगपंचमी के दिन मनाया जाता है। दशकुमार चरित में होली का उल्लेख ' मदनोत्सव ' के नाम से किया गया है।

धर्मशास्त्रों में काम को देवस्वरूप मानकर उनको वंदनीय बनाया गया है। कामदेव काम के देवता हैं और रति उनकी पत्नी हैं। कामदेव को देवी श्रीलक्ष्मी के पुत्र और कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न का अवतार माना गया हैं। कामदेव के आध्यात्मिक रूप को वैष्णव अनुयायियों द्वारा कृष्ण का अवतार भी माना है। जिन्होंने रति के रूप में 16 हजार पत्नियों से महारास रचाया था।

कामदेव का प्रमुख अस्त्र धनुष है। उनके बाण फूलों से बने हुए हैं। इसका अर्थ यह है कि जब कामदेव किसी पर अपना बाण चलाते हैं तो वह मदहोश हो जाता है। वह जीव कामदेव के बाण से सम्मोहित होकर प्रेमपाश में पड़ जाता है।

कामदेव की आंखों को तीर के समान माना गया है। यानी कामदेव की दृष्टि जिसके ऊपर पड़ जाती है। उसका प्रणव जीवन सफल हो जाता है। मान्यता यह भी है कि बसंत पंचमी के दिन ही कामदेव और रति ने पहली बार मानव हदय में प्रेम एवं आकर्षण का संचार किया था और तभी से यह दिन बसंतोत्सव तथा मदनोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा।

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