मल्टीमीडिया डेस्क। पितृपक्ष के दौरान शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं और शास्त्रों में शुभकार्य करने की मनाही की गई है, लेकिन इन दिनों में आप पितृों के अलावा माता लक्ष्मी का आशीर्वाद लेकर धन-धान्य और सुख-समृद्धि में वृद्धि कर सकते हैं। श्राद्धपक्ष में माता महालक्ष्मी का व्रत किया जाता है। इस व्रत को हाथीअष्टमी या गजलक्ष्मी के व्रत के नाम से भी जाना जाता है।

ऐसा है महालक्ष्मी व्रत का पूजाविधान

संध्याकाल में घर के पूजाघर में एक चौकी की स्थापना करें। उसके ऊपर लाल कपड़ा बिछाकर उसके ऊपर केसर मिले चन्दन से अष्टदल बनाएं। अष्टदल पर चावल रखकर उसके ऊपर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करें। स्थापित कलश के पास पास हल्दी से कमल बनाकर उसके ऊपर माता लक्ष्मी की मूर्ति की स्थापना करे। मिट्टी के हाथी की प्रतिमा उसके ऊपर विराजित कर उसको सोने के गहनों से सजाएं। इस समय नया खरीदा गया सोना हाथी पर रखने से पूजा का विशेष लाभ मिलता है।

अपने सामर्थ्य के अनुसार मिट्टी या सोने, चांदी का हाथी खरीदकर लाया जा सकता है। चांदी के हाथी का महत्व सोने के हाथी से ज्यादा होता है इसलिए कोशिश करें कि पूजा के लिए चांदी के हाथी की प्रतिमा घर पर लेकर आएं। देवी महालक्ष्मी के समक्ष श्रीयंत्र रखें और उसके बाद कमल के फूल और दूसरे सुगंधित लाल फूलों से महालक्ष्मी का पूजन करें। साथ में सोने-चांदी के सिक्के पूजा में रखें। स्वादिष्ठ मिठाई और ऋतुफलों का माता को भोग लगाएं।

माता के अष्टस्वरूपों का ध्यान करें और देवी के अष्टस्वरूपों की कुमकुम, गुलाल, अबीर, अक्षत, हल्दी, मेंहदी, वस्त्र और सुगंधित फूल समर्पित कर पूजा करें। माता के समक्ष सुगंधित धूपबत्ती जलाए और गाय के घी का शुद्ध दीपक लगाएं। देवी महालक्ष्मी की आरती करें। पूजास्थल पर बैठकर श्रीसूक्त, कनकधारा स्त्रोत, महालक्ष्मी स्त्रोत में से किसी एक का या संभव हो तो सभी का पाठ करें।

Posted By: Yogendra Sharma

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