मल्टीमीडिया डेस्क। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक मुहर्रम नए साल का पहला पर्व है। मुहर्रम को इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए मातम के रूप में मनाया जाता है। इस्लामिक मान्यता के मुताबिक इस दिन इमाम हुसैन और उनके अनुयायियों की शहादत हुई थी। इसलिए उनको याद करते हुए प्रतीक रूप में ताजिए निकाले जाते हैं। मुहर्रम दुनिया के उन सभी देशों में मनाया जाता है, जहां पर मुस्लिम आबादी आबाद है।

आज 10 सितंबर को मुहर्रम मनाया जा रहा है, जिसको आशूरा भी कहा जाता है। कल 9 तारिख को कत्ल की रात थी। इन दो दिनों में ज्यादातर मुसलमान रोजा रखते हैं और अपना समय इबादत में बिताते हैं। इस दिन बांस, कपड़ों, कागज और दूसरे विभिन्न पदार्थों से ताजिए बनाए जाते हैं। ये ताजिए इमाम हुसैन की कब्र की नकल होते हैं, जिनको ताबूत के रूप में निकाला जाता है। इसके बाद इनको जुलूस की शक्ल में ले जाकर कर्बला में दफन किया जाता है।

मुहर्रम है मातम का त्यौहार

मुहर्रम एक मातम का त्यौहार है। मुहर्रम के महीने के दसवे दिन इमाम हुसैन अपने 72 साथियों के साथ कर्बला के मैदान में शहीद हो गए थे। कहा जाता है कि यजीद के 80 हजार सैनिकों का इमाम साहब ने अपने 72 साथियों के साथ बहादुरी के साथ मुकाबला किया था और जंग में लड़ते हुए शहादत दी थी। मुहर्रम को मुख्यत: शिया अनुयायी मनाते हैं। शिया समुदाय हुसैन अली को अपना खलीफा मानते हैं।

इस दिन ज्यादातर शिया रंगबिरंगे कपड़ों और श्रंगार से दूर रहकर सादगी से मोहर्रम को मनाते हैं। इस दिन काला लिबास पहनते हैं। मोहर्रम पर अपना खून बहाकर उनकी शहादत को याद करते हैं और उनके शहीद होने का गम मनाते हैं। सुन्नी मुस्लिम खून नहीं बहाते बल्कि तलवारों की प्रतिकात्मक लड़ाई कर ताजिए निकालते हैं।

हजरत मोहम्मद के दोस्त इब्ने अब्बास का कहना है कि जिसने मुहर्रम की नौ तारीख का रोजा रखा, उसके दो साल के गुनाह माफ हो जाते हैं। मुहर्रम का एक रोजा 30 रोजों के बराबर होता है। भारत में तैमूरलंग के द्वारा 1398 में पहली बार मोहर्रम का पर्व शुरू करने का साक्ष्य मिलता है।