उज्जैन, तराना। सनातन संस्कृति ऋषियों, मुनियों और संतों की संस्कृति रही है। भारतभूमि पर अनादीकाल से अनेकों संत-महात्माओं ने अपने पुण्यकार्यों से जनमानस का उद्धार किया है। पौराणिक काल में शास्त्रों का ज्ञान देने के साथ जरूरत पड़ने पर ऋषियों ने शस्त्र भी उठाए हैं। ऐसे ही ऋषि-मुनियों के कारण भारतवर्ष सदियों तक विश्व गुरु रहा और विश्व को ज्ञान-विज्ञान की राह दिखलाता रहा।

वैदिक काल से भारतभूमि को दुनिया का अगुआ बनाने का जो सिलसिला शुरू हुआ लंबे समय तक जारी रहा। जनमानस को भक्ति की राह पर अग्रसर करने और उनको देवत्व का ज्ञान प्रदान करने वाले एक ऐसे ही महान संत का नाम नाना महाराज तराणेकर था। जिनके ज्ञान, शास्त्रार्थ, सत्संग, आभामंडल और उनके आशीर्वचन से उनके लाखों शिष्य कृतार्थ हुए। नाना महाराज का तेज और उनकी ख्याती इतनी ज्यादा थी की एक छोटी सी जगह से उनके शिष्य बनने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह देश के दूर दराज के हिस्सों तक फैल गया।

तराना है नाना महाराज की जन्म स्थली

नाना महाराज तराणेकर का जन्म मध्य प्रदेश में उज्जैन जिले के छोटे से कस्बे तराना में 13 अगस्त 1896 को नागपंचमी के दिन हुआ था। नाना महाराज का बचपन का नाम मार्तण्ड था। बालक मार्तण्ड ने बाल्यावस्था में स्कूली शिक्षा अपने पिता से ली और इसके साथ ही पिता के सानिध्य में वेदों का अध्ययन भी किया। बालक मार्तण्ड को कुछ ही समय में वेदों का ज्ञान प्राप्त हो गया। उनके पिता श्री शंकर तराणेकर शास्त्री तराना नगर में वेदों के ज्ञाता और संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। शंकर तराणेकर शास्त्री ने अपने ज्ञान से बच्चों को समृद्ध करने का फैसला किया और शहर में स्थित दत्त मंदिर में वेद पाठशाला प्रारंभ की।

श्री वासुदेवानंद महाराज से ली दीक्षा

सन 1904 में दत्त भगवान के अवतारी परम पूज्य श्री वासुदेवानंदजी महाराज ब्रह्मावर्त ( ब्रह्मावर्त वर्तमान में कानपुर से 20 किलोमीटर दूर गंगा नदी के किनारे बिठूर के नाम से प्रसिद्ध है। ) से तराना के दत्त मंदिर में प्रगट हुए और कार्तिक पूर्णिमा के दिन मार्तण्ड को गुरु दीक्षा दी। मार्तण्ड ने तराना नगर में अपने पिता के वैदिक कार्य को आगे बढ़ाया और वेद पाठशाला का संचालन किया। इसके साथ ही उन्होंने तराना नगर और उसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में यज्ञों का आयोजन किया।

1942 में तराना से किया प्रस्थान

बालक मार्तण्ड दीक्षा लेने के बाद नाना महाराज तराणेकर हो गए और सन 1942 के आसपास वह नगर स्थित प्राचीन दत्त मंदिर की व्यवस्था अपने छोटे भाई महादेव शास्त्री को सौंपकर इंदौर के लिए प्रस्थान कर गए। साल 2002 से नाना महाराज के शिष्यों ने तराना स्थित उनके जन्म स्थान पर कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर दो दिवसीय आयोजन करने का संकल्प लिया। कार्तिक पूर्णिमा के दिन नाना महाराज ने दीक्षा ग्रहण की थी इसलिए इस दिन मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गोवा के विभिन्न इलाकों से उनके अनुयायी तराना में पहुंचते हैं और उनकी स्मृति में सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।

इस साल धार्मिक उत्सव के साथ शास्त्रीय संगीत की भव्य प्रस्तुति माधव कवठेकर, शुभदा मराठे और भुवनेश कोमकली के द्वारा दी गई। इसके साथ ही भव्य सुमधुर भजनों के साथ नाना महाराज तराणेकर को श्रद्धासुमन अर्पित किए गए।

Posted By: Yogendra Sharma

fantasy cricket
fantasy cricket