मल्टीमीडिया डेस्क। नवरात्रि में माता की आराधना से भक्तों की सभी मनोकामना पूर्ण होती है। साधकों को देवी का आशीर्वाद मिलता है और सच्चे मन से मां की भक्ति करने वाले भक्त को आने वाले साल में सभी सफलताएं बड़ी सहजता से मिल जाती है। माता की कृपा से भक्तों के सभी कष्टों का हरण होता है और खुशी और संपन्नता के साथ साथ वह आगे की राह पर बढ़ता चला जाता है।

नवरात्रि पर्व के सातवें दिन देवी के कालरात्रि स्वरूप की पूजा की जाती है। इस दिन साधना करने वाले साधक का मन सहस्त्रधारा चक्र में अवस्थित रहता है। देवी कालरात्रि को रौद्री और धुमोरना देवी के नाम से भी जाना जाता है। देवी को काली, महाकाली, भद्रकाली, भैरवी, मृत्यू, रुद्रानी, चामुंडा, चंडी और दुर्गा के कई विनाशकारी रूपों में से एक माना जाता है। माता कालरात्रि की आराधना से घर की नकारात्मकता का नाश होता है और सकारात्नकता घर में व्याप्त होती है। इनकी उपासना से भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस आदि पैशाचिक शक्तियों का नाश होता है। सौधिकागम में देवी कालरात्रि का वर्णन रात्रि को नियंत्रित करने वाले देवी के रूप में किया गया है।

माँ कालरात्रि का स्वरूप

माता कालरात्रि के शरीर का रंग एकदम अंधकार की तरह काला है। इनके सिर के बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली दैदिप्यमान माला है। देवी कालरात्रि त्रिनेत्रधारी है। माता के तीनों नेत्र विशेष हैं और ब्रह्माण्ड के समान गोल है। माता की आंखों से बिजली के समान चमकीली किरणें निकलती रहती है। माता का स्वरूप अत्यंत भयानक है। माता की नाक से आग की भयंकर ज्वालाएँ निकलती रहती है। देवी का वाहन गधा है और ये अपने ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ से, जो वरमुद्रा में है, से भक्तों को आशीर्वाद देती रहती है। माता कालरात्रि का दाहिनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभयमुद्रा में है। माता के बाईं ओर के ऊपर वाले हाथ में लोहे का काँटा और नीचे वाले हाथ में खड्ग है।

माँ कालरात्रि की कथा

माँ कालरात्रि के संबंध में पुराणों में कई कथानक मिलते हैं। इसमें दुर्गा सप्तशती में देवी कालरात्रि के संबंध में विस्तृत रूप में बताया गया है। इसके साथ ही देवी भागवत में भी देवी का वर्णन किया गया है। माता को काली का स्वरूप माना गया है। मान्यता है कि देवी की आराधना कलियुग में काफी प्रभावी है। दुर्गा सप्तशती में महिषासुर के वध के दौरान माँ भद्रकाली की कथा का वर्णन मिलता है। इसमें कहा गया है कि दैत्यों का विशाल समूह माता को रणभूमि में आते देख उनके ऊपर बाणों की बौछार कर देता है। तब देवी अपने बाणों से असूरों के सभी बाणों को काट देती है और अस्त्र-शस्त्रों को नष्ट कर घोड़े और सारथियों को मार डालती है। देवी नें उसके बाद शूल से महिषासुर पर प्रहार किया, जिससे उसको अपने प्रणों से हाथ धोना पड़ा।

Posted By: Yogendra Sharma