मल्टीमीडिया डेस्क। नवरात्रि के दौरान माता की उपासना अनेकों तरीके से की जाती है और माता अपने भक्तों पर कृपा की बरसात करती है। कुछ भक्त उपवास रखकर देवी उपासना करते हैं तो कुछ मंत्र जाप कर देवी को प्रसन्न करते हैं। जवारे बोने से लेकर जोत जलाना और गरबे से लेकर कन्या भोज तक देवी की उपासना के उपक्रम हैं। इसमें कन्याभोज का शास्त्रों में काफी महिमामंडन किया गया है। नन्ही कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है और उनको सम्मान के साथ भोजन करवाकर उनसे सुख--समृद्धि का आशीर्वाद लिया जाता है।

नवरात्र में कुछ साधक सप्‍तमी और कुछ अष्टमी तिथि से कन्‍या पूजन की शुरूआत हो जाती है और इस दौरान कन्‍याओं को आदर-सत्कार के साथ घर बुलाकर उनकी आवभगत की जाती है। नवरात्रि की दुर्गाष्टमी और नवमी के दिन इन कन्याओं को नौ देवी का स्वरूप मानकर इनका गरिमामय स्वागत किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन कन्याओं का देवियों की तरह आदर सत्कार और भोजन कराने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों को सुख समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।

कन्या पूजन की है प्राचीन परंपरा

ऐसी मान्यता है कि देवी दुर्गा के भक्त पंडित श्रीधर संतानहीन थे। उन्होंने संतान की मनोकामना के लिए नवरात्र के बाद नौ कन्याओं को पूजन के लिए घर पर बुलवाया। मां दुर्गा भी इस दौरान भक्त पंडित श्रीधर के घर पर उन्हीं कन्याओं के बीच बालरूप धारण कर बैठ गई। बालरूप में आईं मां श्रीधर से कहा कि सभी लोगों को भंडारे का निमंत्रण दे दो। श्रीधर से दुर्गा के रूप में आई कन्या की बात मानकर आसपास के गांवों में भंडारे का निमंत्रण दे दिया। इसके बाद देवी के परम भक्त को संतान सुख मिला था।

ऐसे करें कन्‍या पूजन

नवरात्रि की अंतिम तिथियों को अष्टमी और नवमी को कन्या पूजन का प्रावधान है। कन्याभोज में एक छोटे बालक को भी आमंत्रित किया जाता है, जिसको लांगुरिया कहते हैं। कन्या भोज में खीर, पूरी, हलवा, चने की सब्जी आदि पकवान बनाए जाते हैं। उसके बाद आमंत्रित कन्याओं के पैर जल में धोकर उनके पैरों का पूजन भी किया जाता है। तिलक लगाकर हाथ में मौली बांधी जाती है। यथोचित दक्षिणा देकर उनको ससम्मान विदा किया जाता है।

Posted By: Yogendra Sharma

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