Mahamrityunjaya Mantra: देवादिदेव महादेव की आराधना से सभी कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। उनको मुक्तिदाता और वरदान के देव माना जाता है। भोलेनाथ के वेदमंत्रों का जाप करने से तकलिफों का नाश होता है और समृद्धि मिलती है। ऐसा ही एक शास्त्रोक्त मंत्र महामृत्युंजय मंत्र का है, जिसके जपने मात्र से मानव को सुख-समृद्धि, धन-दौलत और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

ऋषि मर्कण्डु के पुत्र थे मार्कण्डेय ऋषि

अब एक सवाल हमारे जेहन में आता है कि आखिर यह अमोघ शक्तियों वाला यह मंत्र आया कहां से? इसकी उत्पत्ति किसने की और इसके पीछे की वजह क्या थी। पौराणिक धर्मग्रंथों के अनुसार मार्कण्डेय ऋषि को अमरत्न का वरदान प्राप्त है। मार्कण्डेय ऋषि का नाम आठ अमर लोगों में शामिल है। मार्कण्डेय ऋषि के पिता का नाम ऋषि मर्कण्डु था। शास्त्रोक्त कथा के अनुसार मर्कण्डु ऋषि को जब लंबे समय तक कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने अपना पत्नी के साथ भगवान शिव की आराधना की। भगवान शिव जब ऋषि दंपत्ति की तपस्या से प्रसन्न होकर जब प्रगट हुए तो उन्होंने ऋषि मर्कण्डु से पूछा कि हे ऋषि तुम गुणहीन दीर्घायु पुत्र चाहते हैं या 16 वर्षीय गुणवानअल्पायु पुत्र। तब मर्कण्डु ऋषि ने दूसरा विकल्प चुना और महादेव से गुणवान अल्पायु पुत्र को मांगा।

यमराज स्वयं आए थे मार्कण्डेय ऋषि के प्राण लेने

मार्कण्डेय जैसे ही बड़ा हुआ उसको अपने अल्पायु होने के संबंध में पता चला। उम्र के बढ़ने के साथ मार्कण्डेय की शिव भक्ति भी बढ़ने लगी। उनको अपनी मौत के संबंध में पता था लेकिन वो इसको लेकर विचलित नहीं थे। 16 साल का होने पर मार्कण्डेय को अपनी मृत्यु का रहस्य अपनी माता के द्वारा पता चला। जिस दिन उनकी मौत का दिन निश्चित था उस दिन भी वह चिंतामुक्त होकर शिव आराधना में लीन थे। शिवपूजा करते समय उनको सप्तऋषियों की सहायता से ब्रह्मदेव से उनको महामृत्युंजय मंत्र ' ऊँ त्र्यंबकम् यजामहे सुगन्धिम् पुष्टिवर्द्धनम्,

ऊर्वारुकमिव बन्धनात, मृत्योर्मुक्षियमामृतात्।।' की दीक्षा मिली। इस मंत्र ने मार्कण्डेय के लिए अमोघ कवच का काम किया और जब यमदूत उनको लेने के लिए आए तो शिव आराधना में लीन मार्कण्डेय को ले जाने में असफल रहे। इसके बाद यमराज स्वयं धरती पर मार्कण्डेय के प्राण लेने के लिए आए।

शिव ने पराजित किया यमराज को

यमराज ने मौत का फंदा ऋषि मार्कण्डेय की गर्दन में डालने की कोशिश की, लेकिन वह फंदा शिवलिंग पर चला गया। वहां पर शिव स्वयं उपस्थित थे। वह यमराज की इस हरकत से नाराज हो गए और अपने रौद्र रूप में यमराज के सम्मुख आ गए। महादेव और यमराज के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसमें यमराज को पराजय का सामना करना पड़ा। भोलेनाथ ने यमराज को इस शर्त पर क्षमा किया कि उनका भक्त ऋषि मार्कण्डेय अमर रहेगा। इसके बाद शिव का एक नाम कालांतक हो गया। कालांतक का अर्थ है काल यानी मौत का अंत करने वाला।

Posted By: Yogendra Sharma

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