हिंदू धर्म में एकादशी का दिन भक्ति और पुण्य कार्यों के लिए काफी अहम माना जाता है। भगवान विष्णु के भक्त इस दिन उपवास रखते हैं। यह उपवास दशमी तिथि की रात से शुरू होता है और द्वादशी की सुबह खत्म होता है। एक साल में आमतौर पर 24 एकादशी पड़ती हैं। हर एकादशी का नाम और महत्व अलग-अलग होता है। चैत्र महीने की एकादशी को वरुथिनी एकादशी कहते हैं। इस साल वरुथिनी एकादशी 7 मई के दिन है। यह तिथि 6 मई के दिन दोपहर 2 बजकर 10 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन यानी 7 मई को दोपहर 3 बजकर 32 मिनट पर समाप्त होगी।

वरूथिनी एकादशी का महत्व

एकादशी का उपवास करने से सुख प्राप्त होता है और मानसिक शांति मिलती है। इस व्रत को रखने से कष्टों से भी छुटकारा मिलता है। इस दिन धार्मिक कर्म में मन लगाना चाहिए। इसके साथ ही पूजन के दौरान ऊं नमो भगवत वासुदेवाय नम: मंत्र का जप करने से विशेष लाभ मिलता है। वरूथिनी एकादशी पर सूर्योदय से पहले सुबह थोड़ा गंगा जल पानी मे डालकर स्नान करें। पूजा के दौरान भगवान को खरबूजे का भोग लगाएं और पूरे दिन भगवान विष्णु का स्मरण करें।

वरूथिनी एकादशी पर क्या न करें

अगर आपने वरुथिनी एकादशी का व्रत रखा है तो उस दिन आपको अन्न का सेवन नहीं करना चाहिए। प्रसाद में सिर्फ फलाहार ही खाएं। भगवान नारायण को तुलसी बहुत प्रिय है, इसलिए उन्हें तुलसी जल भी समर्पित करें। एकादशी व्रत की कथा सुने या पढ़े। इसके साथ ही इस दिन नमक का इस्तेमाल करने से भी परहेज करना चाहिए।

वामन अवतार के बाद होती है पूजा

भगवान विष्णु के छठवें अवतार यानी वामन अवतार के बाद इस दिन पूजा करने और व्रत रखने का प्रावधान शुरू हुआ। इस दिन पूजा करने से बैकुंठ की प्राप्ति होती है। मोक्ष पाने के लिए ही विष्णु भक्त इस दिन पूजा पाठ करते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार मान्यता है कि इस दिन पूजा करने और अच्छे कर्म करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

Posted By: Navodit Saktawat

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