मल्टीमीडिया डेस्क। हिंदु धर्मशास्त्रो में अनेकों व्रत त्यौहार का वर्णन किया गया है। इन त्यौहारों को महीने के तिथियों से जोड़ा गया है और निर्धारित तिथियों पर इन त्यौहारों को हर्षोल्लास, उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। महीने की हर तिथि देवता को समर्पित है और न तिथियों पर संबंधित देवता की आराधना की जाती है। ऐसी ही एक शुभ और पुण्यकारी तिथि द्वादशी है।

हर महीने दो द्वादशी तिथि आती है। एक शुक्ल पक्ष की और दूसरी कृष्ण पक्ष की। इस तिथि का व्रत करने पर देवता की कृपा भक्त पर बनी रहती है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को पद्मनाभ द्वादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन शास्त्रों में भगवान पद्मनाभ की उपासना करने का महत्व बताया गया है। इसलिए श्रद्धालुओं को इस दिन भगवान पद्मनाभ की पूजा करने से सुख-संपत्ति, वैभव और एश्वर्य की प्राप्ति होती है।

पद्मनाभ द्वादशी की पूजा विधि

नवरात्रि की समाप्ति और दशहरा पर्व के एक दिन बाद आश्विन शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन इस व्रत को करने का विधान है। उदया तिथि के साथ व्रत का प्रारंभ होता है। सर्वप्रथम ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर पूजा के लिए स्थान ग्रहण करें। धरती पर कुछ अनाज रखकर उसके ऊपर एक कलश की स्थापना करें। कलश में पूजा के लिए एक सोने से निर्मित भगवान पद्मनाभअर्थान विष्णुजी की प्रतिमा को डाल दें। अबीर, गुलाल, कुमकुम, सुगंधित फूल, चंदन से भगवान पद्मनाभ की पूजा करें। भगवान पद्मनाभ को खीर का भोग लगाएं। ब्राह्मण भोजन का आयोजन करें। ब्राह्मणों वस्त्र, दक्षिणा आदि का दान करें। यह भी मान्यता है कि त्रयोदशी तिथि को इस प्रतिमा को किसी योग्य ब्राह्मण को दान कर दें।

पद्मनाभ द्वादशी की कथा

भगवान श्रीकृष्ण ने पद्मनाभ द्वादशी की कथा हस्तिनापुर अधिपति, महाराज युधिष्ठिर को बतलाई थी। श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा था कि, हे महाराज युधिष्ठिर आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को जो भक्त उपवास करके पद्मनाभ नाम से मेरी आराधना करता है उसको एक हजार गोदान के बराबर फल प्राप्‍त होता है। पद्मनाभ द्वादशी का व्रत कर विधि-विधान से पूजा करने पर मानव की सभी इच्छाएं इस लोक में पूरी होती है और देहवसान के बाद उसको मोक्ष की प्राप्ति होती है।