मल्टीमीडिया डेस्क। धर्मशास्त्रों में उपवासों का काफी महत्व बताया गया है। सप्ताह के सातों दिन के व्रतों को करने का अपना महत्व है और तिथियों के अनुसार व्रत करने का भी महत्व बताया गया है। हर व्रत की अलग विशेषता है, लेकिन एकादशी, पूर्णिमा, सोलह सोमवार, जन्माष्टमी, शिवरात्रि जैसे उपवासों का शास्त्रों में कई गुना गुणगान किया गया है। महीने में दो बार एकादशी का व्रत आता है। दोनों समय व्रत रखने का बड़ा महत्व है। इसी तरह आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी की महिमा को भी विस्तारपूर्वक बताया गया है। इस एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहा जाता है। यदुकुलश्रेष्ठ श्री कृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को इस व्रत की महिमा के बारे में बताया था और कहा था कि इस व्रत के करने से क्या फल मिलता है और इसका विधि-विधान क्या है। इस बार पापांकुशा एकादशी 9 अक्टूबर बुधवार को है।

पापांकुशा एकादशी की कथा

भगवान श्रीकृष्ण ने सम्राट युधिष्ठिर को इस व्रत के संबंध में बताया था। उन्होंने कहा था कि पापांकुशा एकादशी का व्रत करने से अनेकों अश्वमेघ यज्ञों और सूर्य यज्ञ के समान फल की प्राप्‍ति होती है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार विध्‍यांचल पर्वत पर एक अत्यंत ही क्रूर शिकारी क्रोधना निवास करता था। उसका मुख्य काम लोगों को दुख-तकलीफ देना था। उसका अंतिम समय जब आया तो यमराज ने एक दूत को क्रोधना को लेने के लिए भेजा।

क्रोधना क्रूर प्रवृत्ति का होने के बावजूद मौत से खौफ खाता था। जिंदगी बचाने के लिए वह अंगारा नाम के ऋषि की शरण में गया और उनसे मदद की गुहार लगाई। ऋषि अंगारा ने शिकारी क्रोधना को मौत को खौफ से मुक्त होने के लिए पापांकुशा एकादशी के बारे में बताया और इसके व्रत को विधि-विधान से रखने के लिए कहा। क्रोधना ऋषि की आज्ञा का पालन करते हुए पापांकुशा एकादशी के व्रत को रखता है। व्रत के साथ वह श्री हरि की पूजा-अर्चना करता रहा । व्रत के प्रभाव से शिकारी क्रोधना के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसको मुक्ति मिल जाती है।

पापांकुशा एकादशी के व्रत से होती है स्वर्ग की प्राप्ति

भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि यह एकादशी पापों का नाश करती है इसलिए इसको पापांकुशा एकादशी कहा जाता है। जो भक्त इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करता है वह सभी सुखों को भोगकर स्वर्ग की प्राप्ति करता है। मानव को बरसों तक कठोर तप करने से जो फल मिलता है वह श्रीहरी को इस दिन नमस्कार करने से मिल जाता है। जो मानव अपने जीवन में अज्ञानतावश अनेकों पापा करते हैं, परन्तु साथ ही भगवान विष्णु की वंदना करते हैं, वो मृत्यु के बाद नरक नहीं जाते हैं। श्रीहरी की शरणागत होने वाले को यम का भय नहीं रहता है और उसको यम की यातना भी भोगना नहीं पड़ती है।

यदुकुलश्रेष्ठ श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि हजारों वाजपेय और अश्वमेध यज्ञों के करने से जो फल मानव को प्राप्त होता है, वह एकादशी के व्रत के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं होता है। एकादशी का व्रत करने के बराबर कोई पुण्य नहीं है। इस व्रत के समान कुछ भी तीनों लोकों में नहीं है। पापांकुशा एकादशी का व्रत करना मानव के जरूरी है, क्योंकि जब तक मानव इस व्रत को नहीं करता है उसका शरीर पापों से मुक्त नहीं होता है।

युधिष्ठिर, यह एकादशी आरोग्य, सुंदर और सुशील स्त्री, स्वर्ग और मोक्ष को देने वाली है। एकादशी के व्रत के समान गंगा, गया, काशी, कुरुक्षेत्र और पुष्कर भी पुण्य देने वाले नहीं हैं। इस एकादशी के व्रत को करने से दस पीढ़ी मातृ पक्ष, दस पीढ़ी पितृ पक्ष, दस पीढ़ी स्त्री पक्ष तथा दस पीढ़ी मित्र पक्ष का उद्धार हो जाता हैं। पितृ दिव्य देह धारण कर चतुर्भुज रूप होकर, पीतांबर पहनकर, हाथ में माला धारण कर गरुड़ पर सवरा होकर विष्णुलोक को प्रस्थान करते हैं