मल्टीमीडिया डेस्क। मानव जीवन में संस्कारों का बड़ा महत्व है। सनातन संस्कृति में जीवन को सोलह संस्कारों में पिरोया गया है। जिसकी शुरुआत गर्भाधान संस्कार से होती है और मृत्यु के बाद दाह संस्कार अंतिम संस्कार होता है। इसके बाद भी पितृ स्मृतियों में बने रहे, उनके प्रति आदरभाव बना रहे इसलिए धर्मशास्त्रों में श्राद्ध, तर्पण आदि का प्रावधान किया गया है। पितृकर्म कुछ खास जगहों पर करने का विशेष महत्व है। इसमें से एक गुजरात का सिद्धुपुर है।

बिंदु सरोवर के तट पर होता है माता का श्राद्ध

सिद्धपुर गुजरात के पाटन जिले में है और इसको सिद्ध स्थल के नाम से भी जाना जाता है। यह एकमात्र ऐसा तीर्थ है जहां पर सिर्फ मातृश्राद्ध का प्रावधान है। सिद्धपुर का वर्णन ऋगवेद में मिलता है। सिद्धपुर में सबसे महत्वपूर्ण स्थल बिंदु सरोवर है। शास्त्रों में सिद्धपुर के संबंध में एक कथा का वर्णन है। प्राचीनकाल में कपिल मुनि नाम के विद्वान संत थे। उनकी माता का नाम देवहुति और पिता का कर्दम था। कपिल मुनि को सांख्य दर्शन का प्रणेता और भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है।

एक समय जब उनके पिता ऋषि कर्दम तपस्या के लिए वन में प्रस्थान कर गए तो उनकी माता देवहुति काफी दुखी हो गई। ऐसे में पुत्र कपिल मुनि ने सांख्य दर्शन की विवेचना करते हुए उनका ध्यान भगवान विष्णु में केन्द्रित किया। ऐसे में श्रीहरी में ध्यान लगाते हुए माता देवहुति देवलोकगमन कर गई। मान्यता है कि बिंदु सरोवर के तट पर माता के देहावसान के पश्चात कपिल मुनि ने उनकी मोक्ष प्राप्ति के लिए अनुष्ठान किया था। इसके बाद से यह स्थान मातृ मोक्ष स्थल के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

कपिल मुनि ने कार्तिक महीने में यह अनुष्ठान किया था,इसलिए हर साल यहाँ पर कार्तिक महीने में विशाल मेले का आयोजन होता है और दूरदराज से लोग इस जगह अपनी मां का श्राद्ध करने के लिए आते हैं। एक मान्यता यह भी है कि भगवान परशुराम ने भी अपनी माता का श्राद्ध सिद्धपुर में बिंदु सरोवर के तट पर किया था। मातृ हन्ता के पाप से मुक्त होने के ऋषि परशुराम ने यहां पर कर्मकांड किया था। सिद्धुपुर में एक पीपल का पवित्र वृक्ष है, जिसको मोक्ष पीपल कहा जाता है और मोक्ष पीपल पर पुत्र माँ की मोक्ष के लिए प्रार्थना करते है।

पिण्डारक में तैरते हैं पितृों को दिए गए पिण्ड

गुजरात में पितृों को तारने वाला एक और तीर्थ पिण्डारक या पिण्डतारक है। पिण्डारक द्वारिका से लगभग 30 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। इस स्थान पर एक सरोवर है। इस तालाब में तीर्थयात्री श्राद्धकर्म करके पिंड सरोवर में डाल देते हैं। इस सरोवर की खासियत यह है कि इसमें डाले गए पिण्ड डूबते नहीं बल्कि तैरते रहते हैं। पिण्डारक में कपालमोचन महादेव, मोटेश्वर महादेव, ब्रह्माजी का मंदिर और श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभु की बैठक भी है। मान्यता है कि

इस क्षेत्र का प्राचीन नाम पिण्डारक या पिण्डतारक है। यह जगह गुजरात में द्वारिका से लगभग 30 किलोमीटर दूरी पर है। यहां एक सरोवर है, जिसमें यात्री श्राद्ध करके दिए हुए पिंड सरोवर में डाल देते हैं। वे पिण्ड सरोवर में डूबते नहीं बल्कि तैरते रहते हैं। यहां कपालमोचन महादेव, मोटेश्वर महादेव और ब्रह्माजी के मंदिर हैं। साथ ही श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभु की बैठक भी है।

कहा जाता है कि यहां महर्षि दुर्वासा का आश्रम था। महाभारत युद्ध के बाद पांडव सभी तीर्थों में अपने मृत बांधवों का श्राद्ध करने के लिए गए थे। पिण्डारक में उन्होंने लोहे का एक पिण्ड बनाया और जब वह पिंड भी जल पर तैर गया तब पाण्डवों को इस बात का विश्वास हुआ कि उनके बंधु-बांधव जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो गये हैं। यह भी मान्यता है कि महर्षि दुर्वासा के वरदान से इस तीर्थ में पिंड तैरते रहते हैं।

Posted By: Yogendra Sharma

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