Pitru Paksha 2020 : प्रमोद यादव, वाराणसी। पितृ पक्ष 17 सितंबर तक चलेगा। इसमें पितरों का तर्पण किया जाता है। इसे इसे लेकर बहुत सी मान्‍यताएं, धारणाएं प्रचलित हैं जो कि शुभ व अशुभ से जुड़ी हैं। यह माना जाता है कि इस अवधि में नया कार्य आरंभ नहीं होता है, ना ही कोई शुभ कार्य किया जाता है। क्रय विक्रय, खरीदारी, भूमिपूजन, संपत्ति के मामले, विवाह आदि प्रसंग इस दौरान नहीं किया जाना चाहिये। लेकिन आपको यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि यह सब सच नहीं है। धर्मशास्‍त्र तो इन बातों को सिरे से खारिज करते ही हैं, विद्वान गण भी इन्‍हें असत्‍य बताते हैं। यहां हम आपको बताने जा रहे हैं कि पितृ पक्ष को लेकर समाज में बरसों से चली आ रहीं मान्‍यताओं की क्‍या सत्‍यता है।

विद्वतजन बताते हैं कि पितरों का दर्जा देव कोटि में आता है। उन्हें विवाह समेत शुभ कार्यों तक में आमंत्रित किया जाता है। पितृ पक्ष उनके स्मरण और श्रद्धापूर्वक श्राद्ध का काल है। ऐसे में होना यह चाहिए कि हम इतनी खरीदारी करें कि हमारी समृद्धि देखकर पितर भी प्रसन्न हों। शास्त्र बताते हैं कि हर साल आश्विन माह के कृष्ण पक्ष में आने वाले पितरों की आराधना-साधना के पुण्य काल श्राद्ध पक्ष में अपने पूर्वजों का आह्वान किया जाता है। श्रद्धापूर्वक उनका श्राद्ध-तर्पण कर स्वागत और स्तुति गान किया जाता है। इससे प्रसन्न हो वे वंश वृद्धि, यश-कीर्तिं, सुख-समृद्धि समेत मंगलमय जीवन का आशीष दे जाते हैं। धर्मशास्त्र के प्रतिकूल मान्यता और परंपरा की आड़ में कई भ्रांतियां शुभ-अशुभ का हवाला देते हुए इस दौरान खरीद-बिक्री के निषेध का हौवा बनाती हैं।

इस अवधि में दान करने वाला धन-धन्यादि से संपन्न होता है

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभागाध्यक्ष प्रो. विनय पांडेय के अनुसार इस काल में पितरों के उद्देश्य से किया गया कर्म जैसे दान, तर्पण, श्राद्ध आदि यज्ञ के समान अक्षुण्ण फल को देने वाला होता है (क्रतुभिस्तानि तुल्यानि पितृणां दत्तमक्षयम्‌)। अतः इस काल में पितरों के उद्देश्य से श्रद्धा पूर्वक तर्पण, पिंडदान एवं अन्य दानादि कर्म यज्ञ के समान फलों को देने वाला और पितृ ऋण से मुक्ति के साथ धन-धन्यादि से संपन्न होता है।अखिल भारतीय विद्वत परिषद के महासचिव डॉ. कामेश्वर उपाध्याय के अनुसार पितृ पक्ष तो शुभ पक्ष है। तुलसीदास ने भगवान शिव को भी पितर कहा है और तर्पण ऋषियों का नैत्यिक कार्य था। पितृ पक्ष में पितरों के श्राद्ध-तर्पण से सुख-समृद्ध आती है। ऐसे समय में खरीद बिक्री का कोई निषेध शास्त्रों में नहीं है।

पितरों को तृप्त करेगी खरीदारी

श्रीकाशी विद्वत परिषद के मंत्री डॉ. रामनारायण द्विवेदी के अनुसार पितृ पक्ष पितरों को श्रद्धा समर्पिंत करने व उनसे सुख-समृद्धि का आशीष प्राप्त करने का पर्व है। इसमें कब इस तरह की भ्रांतियों का प्रवेश हुआ और इस पक्ष को भयावह बना दिया गया, पता नहीं। इस अवधि में भू-भवन या संपत्ति की खरीद पितरों को तृप्त करेगी। कैसे संभव है दान

ज्योतिषाचार्य पं. ऋषि द्विवेदी बताते हैं कि पितृ पक्ष चातुर्मास के बीच पड़ने से इस अवधि में मुहूर्त नहीं होते। ऐसे में मांगलिक कार्यों को वर्जिंत बताया गया है। हालांकि यह न तो अशुभ काल है और न ही इसमें कोई अन्य वर्जना है। इस अवधि में भूमि-दुकान-मकान की खरीद के साथ ही गृह प्रवेश भी हो सकते हैं और इसके मुहूर्त भी हैं।

Posted By: Navodit Saktawat

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