मल्टीमीडिया डेस्क। प्रदोष व्रत प्रमुख रूप से भगवान शिव को समर्पित है। प्रदोष के साथ चंद्रमा के रोगग्रस्त होने की कथा भी जुड़ी हुई है। पौराणिक मान्यता के अनुसार चंद्रमा को क्षयरोग हो गया था, जिसकी वजह से उनको मृत्युतुल्य कष्ट हो रहे थे। भगवान शिव ने चंद्रमा के क्षयरोग का निवारण कर उनको त्रयोदशी के दिन फिर से जीवन प्रदान किया था। इसीलिए इस दिन को प्रदोष कहा जाने लगा।

सर्वकार्य सिद्धि हेतु शास्त्रों में कहा गया है कि यदि कोई भी 11 अथवा एक साल के सभी प्रदोष के व्रत करता है तो उसकी समस्त मनोकामनाएं जल्द पूर्ण होती है। प्रदोष का व्रत रखने से चंद्र ठीक होता है। ऐसा कहा जाता है कि चंद्र के सुधरने से शुक्र सुधरता है और शुक्र के सुधरने से बुध के दोष ठीक हो जाते है और मानसिक तनाव खत्म हो जाता है।

दोष व्रत की विधि

प्रदोष व्रत का विधान सामान्य व्रतों की तरह है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर महादेव की पूजा करना चाहिए। इस दिन व्रत रखने वाले भक्तों को पूरे दिन निराहार रहकर मानसिक रूप से 'ओम नम: शिवाय' का जाप करना चाहिए। त्रयोदशी तिथि पर सूर्यास्त से तीन घड़ी पहले शिवजी की पूजा-आराधना करें। संध्याकाल मे दोबारा स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर घर के पूजन स्थल को शुद्ध कर पूजा करें। शिव मंदिर में भी पूजा कर सकते है।

व्रत में खानपान का रखें ख्याल

ज्यादातर भक्त प्रदोष व्रत पूरे दिन निराहार रहकर करते हैं, लेकिन गाय का दूध पीकर भी व्रत का पालन किया जा सकता है। प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा कर फलाहार कर सकते हैं, लेकिन नमक से परहेज करना बेहतर रहेगा।

प्रदोष व्रत सामग्री

कुमकुम, अबीर, गुलाल, हल्दी, मेंहदी, वस्त्र, जनेउ, धूप, दीप, घी, सफेद फूल, बेल-पत्र, धतुरा, भांग, हवन सामग्री, जल से भरा हुआ कलश, कपूर आदि।