Puja Path Ke Niyam। हिंदू धर्म में पूजा पाठ को लेकर देश में अलग-अलग स्थान पर अलग-अलग परंपराएं हैं, लेकिन एक बात सामान्य तौर पर एक जैसी देखने को मिलती है, वो यह कि जब भी कोई शुभ कार्य होता है तो उसमें पूजा के दौरान पति-पत्नी साथ में बैठकर पूजा करते हैं। इसके पीछे धार्मिक मान्यता है कि पति या फिर पत्नी को अकेले पूजा करते हैं तो पूर्ण फल की प्राप्ति नहीं होती है। इसके अलावा किसी तीर्थ यात्रा में भी पति या पत्नी अकेले यात्रा के लिए नहीं जाते हैं। यहां जानें धार्मिक मान्यताओं में पति पत्नी को एक साथ होना क्यों जरूरी माना गया है -

सात वचन में से एक वचन

पौराणिक मान्यता है कि विवाह के समय पति-पत्नी एक दूसरे से 7 वचन लेते हैं और इसमें एक वचन होता है कि सभी पूजा कर्म, तीर्थ यात्रा जैसे धार्मिक कार्य साथ मिलकर करेंगे। एक साथ धार्मिक काम करने से वैवाहिक जीवन में खुशियां आती हैं और जीवन में कोई तनाव नहीं रहता है। इसी कारण धार्मिक मान्यता है कि किसी भी शादीशुदा महिला को शुभ कार्य में अकेले पूजा नहीं करना चाहिए, यदि ऐसा किया जाता है कि मनोवांछित फल की प्राप्ति नहीं होती है और न ही तीर्थ यात्रा पूर्ण होती है। इसके अलावा धार्मिक मान्यता यह भी है कि स्त्री को पुरुष की शक्ति माना जाता है। इसी कारण देवी-देवताओं का नाम लेने से पहले शक्ति स्वरूप देवी का भी नाम लिया जाता है।

साथ में पूजा करने के फायदे

पति-पत्नी यदि साथ में कोई धार्मिक पूजन करते हैं तो दोनों में तालमेल और प्रेम बढ़ता है। वाद-विवाद होने की संभावना काफी कम हो जाती है। भगवान शिव से अर्धनारीश्वर स्वरूप धारण करके स्त्री और पुरुष के समानता का संदेश दिया था। इसलिए हर कार्य में स्त्री को सहभागिनी बनाया जाता है। शिव जी ने इस स्वरूप को रखकर संसार को संदेश दिया था कि बिना स्त्री पुरुष अधूरा है और बिना पुरुष स्त्री अधूरी है। ईश्वर की नजर में दोनों समान है और दोनों का सम्मान भी बराबर है।

Posted By: Sandeep Chourey

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