मल्टीमीडिया डेस्क। सावन मास के प्रारंभ होने के साथ ही भक्त पूरे जतन के साथ शिवभक्ति में लीन हो जाते हैं और अनेकों उपाय से शिव को प्रसन्न कर मनोकामना पूर्ण करने के लिए साधना का मार्ग अपना लेते हैं। मान्यता है कि सावन के सोमवार के दिन शिव की विधि-विधान से उपासना करने से अनन्त गुना फल मिलता है। धरती पर कई जगहों पर स्वयंभू शिवलिंग विद्यमान है और कई पौराणिक ऐतिहासिक शिव मंदिरों में शास्त्रोक्त विधान से शिवलिंग की स्थापना की गई है और इनकी उपासना से मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

महादेव की भक्ति के कई प्रकारों का शास्त्रों में वर्णन किया गया है। इनमें सबसे सरल, सहज और शिव को प्रिय जलाभिषेक है। सावन के महीने में शिवलिंग का जलाभिषेक करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है। भक्त कांवड़ यात्रा के जरिए शिव को जल समर्पित करते हैं। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और क्षमता के हिसाब से कांवड़ यात्रा का आयोजन करते हैं और पवित्र नदियों से जल भरकर शिव मंदिरों में शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं।

कांवड़ यात्रा मुख्यत: चार प्रकार की होती है। जिसमें शामिल होकर भक्त शिव साधना करते हैं।

सामान्य कांवड़ यात्रा

इस कांवड़ यात्रा में कावड़िए विश्राम करते हुए अपनी कांवड़ यात्रा को जारी रख सकते हैं। इसके लिए शिवभक्त कई जगहों पर कांवड़ियों के विश्राम की व्यवस्था करते हैं और कांवड़िए अपनी थकान मिटाकर फिर से अपने गंतव्य स्थल की और रवाना हो जाते हैं।

डाक कांवड़

शिव भक्ति की कांवड़ यात्रा का दूसरा स्वरूप है डाक कांवड़। इस कांवड़ यात्रा में शिवभक्त कांवडिए बगैर रुके अपनी यात्रा को तय करते हैं। इस दौरान कांवड़िए बगैर विश्राम किए जल भरने से लेकर शिव मंदिर में शिव जलाभिषेक तक किसी भी जगह पर आराम करने के लिए नहीं ठहरते हैं और निरंतर चलते रहते हैं। डाक कांवड़ियों के लिए विशेष इंतजाम भी किए जाते हैं।

खड़ी कांवड़

कुछ शिवभक्त खड़ी कांवड़ का आयोजन करते हैं। इसके अंतर्गत कांवड़िए खड़ी कांवड़ लेकर चलते हैं। यात्रा के दौरान उनका साथी या सहयोगी पूरे समय उनके साथ रहता है। जब कांवड़ लेकर चलने वाला कांवड़िया थक जाता है तो उसका साथी कांवड़ को ले लेता है और वह अपनी मजिल की और प्रस्थान करता है। खड़ी कांवड़ को बड़े ही जोशीले अंदाज में निकाला जाता है।

दांडी कांवड़

दांडी कावड़ कांवड़ यात्रा का सबसे कठिन तरीका है। इस कांवड़ यात्रा में दंडवत होकर कांवड़ यात्रा निकाली जाती है। इसमें लेटकर या शरीर को दंडवत करते हुए जलग्रहण क्षेत्र से शिव मंदिर तक की दूरी तय की जाती है। इस यात्रा में एक महीने तक का समय लग जाता है।