मल्टीमीडिया डेस्क। शिव आराधना के अनेक तरीके शास्त्रों में दिए गए हैं। मंत्र, स्तुति, श्लोक, यज्ञ, अभिषेक आदि अनेक उपायों से महादेव की भक्ति की जाती है। भोलेनाथ मात्र एक लोटा जल चढाने से प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों को अभय का वरदान दे देते हैं। शिव उपासना के अनेकों मंत्र है, इनमें पंचाक्षरी मंत्र सबसे ज्यादा प्रचलित और प्रभावी है।

किं तस्य बहुभिर्मन्त्रै: किं तीर्थै: किं तपोऽध्वरै:।

यस्यो नम: शिवायेति मन्त्रो हृदयगोचर:।।

'जिसके हृदय में 'ॐ नम: शिवाय' यह मन्त्र निवास करता है, उसके लिए बहुत-से मन्त्र, तीर्थ, तप और यज्ञों की क्या आवश्यकता है।'

शिवमुख से निकला है पंचाक्षर मन्त्र

महादेव का पंचाक्षर मन्त्र 'नम: शिवाय' श्रेष्ठ है। इस मन्त्र के प्रारंभ में यदि प्रणव यानी ओम लगा दे तो यह षडक्षर मन्त्र 'ओम नम: शिवाय' हो जाता है। संसार की मोहमाया में बंधे मानव की मुक्ति के लिए देवादिदेव महादेव ने 'ओम नम: शिवाय' इस आदि मन्त्र का प्रतिपादन किया। पंचाक्षर और षडक्षर मन्त्र में स्वयं भगवान शिव बसते हैं इसलिए इसको 'पंचाक्षरी विद्या' भी कहते हैं। यह मन्त्र सभी श्रुतियों का सिरमौर, सम्पूर्ण उपनिषदों की आत्मा और शब्द समुदाय का बीजरूप माना जाता है। पंचाक्षर मंत्र के जाप से मानव का मोक्ष होकर वह शिवस्वरूप हो जाता है। स्वयं भगवान शिव का कहना है कि यह सबसे पहले मेरे मुख से निकला है, इसलिए यह मेरे ही स्वरूप का प्रतिपादन करने वाला है।

महादेव ने देवी पार्वतीजी को इस पंचाक्षर मन्त्र की महिमा को विस्तारपूर्वक बताते हुए कहा था कि प्रलयकाल में सृष्टि में जब सब खत्म हो गया और सभी पदार्थ प्रकृति में समा गए। उस समय सिर्फ मेरा अस्तित्व रह गया था और सभी देवता, वेद और शास्त्र मेरी शक्ति से पंचाक्षर मन्त्र में स्थित रहते हैं। भगवान शिव ने सबसे पहले ब्रह्मा को यह मंत्र दिया था। इसलिए इसको ब्रह्मविद्या भी कहते हैं।

वामदेव हैं पंचाक्षर मन्त्र के ऋषि

पंचाक्षर मन्त्र के ऋषि वामदेव, छन्द पंक्ति और देवता शिव हैं। आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके इस मन्त्र का जप करना चाहिए। रुद्राक्ष की माला से जप करने पर इसका अनन्तगुना फल मिलता है। स्त्री, शूद्र आदि सभी भक्त इस मन्त्र का जप कर सकते हैं। इस मन्त्र के लिए दीक्षा, होम, संस्कार, तर्पण और गुरुमुख से उपदेश की कोई आवश्यकता नहीं है। यह मन्त्र सदा पवित्र रहता है। इस मन्त्र का जप करने से पहले भगवान शिव का इस मंत्र से ध्यान करना चाहिए।

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं,

रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृग वराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।

पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं

विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्।।

चांदी के पर्वत के समान जिनकी श्वेत कान्ति है, जो ललाट पर सुन्दर अर्धचन्द्र को आभूषण रूप में धारण करते हैं, रत्नमय अलंकारों से जिनका शरीर उज्जवल है, जिनके हाथों में परशु तथा मृग, वर और अभय मुद्राएं हैं, पद्म के आसन पर विराजमान हैं, देवतागण जिनके चारों ओर खड़े होकर स्तुति करते हैं, जो बाघ की खाल पहनते हैं, जो विश्व के आदि, जगत् की उत्पत्ति के बीज और समस्त भयों को हरने वाले हैं, जिनके पांच मुख और तीन नेत्र हैं, उन महेश्वर का प्रतिदिन ध्यान करें।

इस मन्त्र का जाप करने के लिए लग्न, तिथि, नक्षत्र, वार और योग का विचार नहीं किया जाता है। पंचाक्षरी मंत्र कभी सुप्त नहीं होता है, हमेशा जाग्रत ही रहता है। इस मंत्र का जाप सभी भक्त कर सकते हैं।

शास्त्रों में कहा गया है कि पंचाक्षरी मंत्र मुक्तिप्रदाता, मोक्ष देने वाला, विभिन्न प्रकार की सिद्धियों को देने वाला, इहलोक और परलोक के सुखों को देने वाला और सभी तरह के पापों का नाश करने वाला है।

योगेंद्र शर्मा