मल्टीमीडिया डेस्क। देवादिदेव महादेव की कृपा से मनुष्य के दैहिक, दैविक और भौतिक सभी तरह के तापों से छुटकारा मिल जाता है। भस्मधारी महादेव की आराधना सात्विक तरीके से मन से करने पर वह मनचाहा वरदान देते हैं। सभी प्रमुख देवताओं की प्रतिमा, उनके चरण या विग्रह की पूजा का विधान है, लेकिन शिव ब्रह्माण्ड में इकलौते देवता हैं जिनकी प्रतिमा से ज्यादा उनके लिंग की पूजा की जाती है और शास्त्रों के मतानुसार शिवलिंग की पूजा से मानव के ग्रहदोषों से लेकर सारे दुखों का नाश होता है और वह धरती पर उपलब्ध सभी सुखों को भोग कर मोक्ष प्राप्त कर कैलाशवासी बनता है।

शास्त्रों में विभिन्न तरह के शिवलिंग की पूजा का विधान बताया गया है, जिसमें धातु से लेकर पाषाण और मिट्टी तक के शिवलिंग शामिल है। शास्त्रों में पूजा के अनुसार यानी किसके द्वारा शिवलिंग की स्थापना की गई है, शिवलिंग के छह प्रकार बताए गए हैं।

देव लिंग

जिस शिवलिंग को देवताओं के द्वारा या दूसरे किसी प्राणी के द्वारा स्थापित किया गया हो, उसको देवलिंग कहते हैं। इस तरह के शिवलिंग देवताओं के द्वारे पूजे जाते हैं।

आसुर लिंग

असुरों द्वारा पूजे जाने वाले लिंग को आसुर लिंग कहा जाता है। प्राचीनकाल में रावण आदि असूरों ने इस तरह के शिवलिगं की स्थापना कर मनचाहे फल की प्राप्ति की थी।

अर्श लिंग

इस तरह के लिंग की स्थापना ऋषि, मुनि और संतों के द्वारा की जाती थी। शास्त्रोक्त विधि-विधान से स्थापित किए गए ऐसे शिवलिंग संतों और उनके अनुयायियों के द्वारा पूजे जाते थे।

पुराण लिंग

पौराणिक काल में मानव के द्वारा स्थापित किए गए शिवलिंग को पुराण लिंग कहा जाता है।

मानव लिंग

प्राचीन काल में राजा-महाराजा, महापुरूषों और श्रेष्ठी वर्ग के द्वारा स्थापित किए गए लिंग मानव लिंग कहलाते हैं।

स्वयंभू लिंग

स्वयं धरती में से प्रकट हुए लिंग को स्वयंभू शिवलिंग कहा जाता है। भारत मे कई जगहों पर स्वयंभू शिवलिंग विद्यमान है, जिनकी शिवभक्त भक्तिभाव से पूजा-अर्चना करते हैं।

योगेंद्र शर्मा

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Posted By: Yogendra Sharma

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