भगवान शिव और मां पार्वती का विवाहोत्सव महाशिवरात्रि इस बार 21 फरवरी को विष योग में मनाई जाएगी। इससे पहले 2 मार्च 1992 को महाशिवरात्रि भी इसी विष योग में मनाई गई थी। जब शनि और चंद्रमा एक साथ एक राशि में होते हैं, तो उसे ज्योतिष में इसे विष योग कहा जाता है। दरअसल, शनि को दुख, पीड़ा का कारक माना जाता है, जब मन का कारक चंद्रमा शनि के साथ होता है, तो व्यक्ति को मानसिक तनाव, अवसाद, चिंता, डर लगा रहता है।

ऐसे में जिन लोगों की कुंडली में विष योग हो, उन्हें शिवरात्रि पर पूजन, व्रत आदि करने से विशेष लाभ मिलता है। बताते चलें कि इस बार महाशिवरात्रि 21-22 फरवरी की रात मनाई जाएंगी और इस समय शनि और चंद्रमा की मकर राशि में युति होने से विष योग बनेगा। ज्योतिषियों का मानना है भगवान शिव ने विष ग्रहण कर संसार को इसके कष्ट से मुक्त किया था। इस योग में महाशिवरात्रि होने से दर्शन के लिए आए भक्तों को भी कष्टों से राहत मिल सकती है। उज्जैन के महाकाल मंदिर में साल में केवल एक बार महाशिवरात्रि के दूसरे दिन भगवान की भस्मआरती दोपहर में होती है।

जब सूर्य कुंभ राशि में और चंद्रमा मकर राशि में होता है, तब फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि की रात यह पर्व मनाया जाता है। 21 फरवरी की शाम 5 बजकर 36 मिनट तक त्रयोदशी तिथि रहेगी। उसके बाद चतुर्दशी तिथि शुरू हो जाएगी। शिवरात्रि रात्रि का पर्व है और 21 फरवरी की रात चतुर्दशी तिथि रहेगी, इसलिए इस साल यह पर्व 21 फरवरी को मनाया जाएगा।

शनि अपनी ही मकर राशि में हैं और शुक्र अपनी उच्च की राशि मीन में हैं, जो कि एक दुर्लभ योग है। इस योग में भगवान शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना को श्रेष्ठ माना गया है। महाशिवरात्रि को शिव पुराण और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना चाहिए। देवगुरु बृहस्पति अपनी राशि धनु में स्थित हैं।

महामृत्युंजय मंत्र

महामृत्युंजय मंत्र जपने से अकाल मृत्यु तो टलती ही है, आरोग्यता की भी प्राप्ति होती है। हामृत्युंजय मंत्र से शिव पर अभिषेक करने से जीवन में कभी सेहत की समस्या नहीं आती। ज्योतिष के अनुसार यदि जन्म, मास, गोचर और दशा, अंतर्दशा, स्थूलदशा आदि में ग्रहपीड़ा होने का योग हो, तो इस मंत्र का जाप विशेष लाभ देता है।

ऊँ त्र्यंबकम् यजामहे सुगंधिम् पुष्टिवर्द्धनम्।

ऊर्वारुकमिव बंधनात, मृत्योर्मुक्षिय मामृतात्।।

Posted By: Shashank Shekhar Bajpai

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