पौराणिक कथाओं में शनि को दंडाधिकारी और न्यायप्रिय देवता माना जाता है। फलित ज्योतिषी में भी शनि ग्रह न्यायपूर्ण कहे जाते हैं। शनि सूर्य और छाया के पुत्र और स्वयं भगवान शिव के शिष्य हैं। शनि जयंती पूरे उत्तर भारत में पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह की अमावस्या को मनाई जाती है। वहीं दक्षिणी भारत के अमावस्यांत पंचांग के अनुसार शनि जयंती वैशाख अमावस्या को मनाई जाती है। संयोगवश उत्तर भारत में ज्येष्ठ अमावस्या को शनि जयंती के साथ-साथ वट सावित्री व्रत भी रखा जाता है। मध्यभारत में वट-सावित्री व्रत पूर्णिमा को मनाया जाता है।

कौन हैं शनिदेव

शनिदेव भगवान सूर्य तथा छाया (संवर्णा) के पुत्र हैं। शनि के अधिदेवता प्रजापति ब्रह्मा और प्रत्यधिदेवता यम हैं। वाहन गिद्ध हैं और वर्ण कृष्ण है, कृष्ण वर्ण होने की भी एक कथा है। शनिदेव के जन्म के बारे में स्कंदपुराण के काशीखंड में जो कथा मिलती है उसके अनुसार राजा दक्ष की कन्या संज्ञा का विवाह सूर्यदेवता के साथ हुआ।

सूर्यदेवता का तेज बहुत अधिक था जिसे लेकर संज्ञा परेशान रहती थी। वह सोचा करती कि किसी तरह तपादि से सूर्यदेव की अग्नि को कम करना होगा। जैसे तैसे दिन बीतते गये संज्ञा के गर्भ से वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना तीन संतानों ने जन्म लिया।

संज्ञा अब भी सूर्यदेव के तेज से घबराती थी फिर एक दिन उन्होंने निर्णय लिया कि वे तपस्या कर सूर्यदेव के तेज को कम करेंगी लेकिन बच्चों के पालन और सूर्यदेव को इसकी भनक न लगे इसके लिये उन्होंने एक युक्ति निकाली उन्होंने अपने तप से अपनी हमशक्ल को पैदा किया जिसका नाम संवर्णा रखा। संज्ञा ने बच्चों और सूर्यदेव की जिम्मेदारी अपनी छाया संवर्णा को दी और कहा कि अब से मेरी जगह तुम सूर्यदेव की सेवा और बच्चों का पालन करते हुए नारीधर्म का पालन करोगी लेकिन यह राज सिर्फ मेरे और तुम्हारे बीच ही बना रहना चाहिये।

अब संज्ञा वहां से चलकर पिता के घर पंहुची और अपनी परेशानी बताई तो पिता ने डांट फटकार लगाते हुए वापस भेज दिया लेकिन संज्ञा वापस न जाकर वन में चली गई और तपस्या में लीन हो गई। उधर सूर्यदेव को जरा भी आभास नहीं हुआ कि उनके साथ रहने वाली संज्ञा नहीं संवर्णा है।

संवर्णा अपने धर्म का पालन करती रही उसे छाया रूप होने के कारण उन्हें सूर्यदेव के तेज से भी कोई परेशानी नहीं हुई। सूर्यदेव और संवर्णा के मिलन से भी मनु, शनिदेव और भद्रा (तपती) तीन संतानों ने जन्म लिया।

शनि के जन्म की एक अन्य कथा में उनके कृष्ण वर्ण के होने के कारण का भी उल्लेख है। इस कथा के अनुसार शनिदेव का जन्म महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में कश्यप यज्ञ से हुआ। छाया शिव की भक्त थीं। जब शनिदेव छाया के गर्भ में थे तो छाया ने भगवान शिव की कठोर तपस्या कि वे खाने-पीने की सुध तक उन्हें न रही।

भूख-प्यास, धूप-गर्मी सहने के कारण उसका प्रभाव छाया के गर्भ मे पल रही संतान अर्थात शनि पर भी पड़ा और उनका रंग काला हो गया। जब शनिदेव का जन्म हुआ तो उनका रंग देखकर सूर्यदेव ने छाया पर संदेह किया और उन्हें अपमानित करते हुए कह दिया कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता।

मां के तप की शक्ति शनिदेव में भी आ गई थी उन्होंने क्रोधित होकर अपने पिता सूर्यदेव को देखा तो सूर्यदेव बिल्कुल काले हो गए, उनके घोड़ों की चाल रूक गयी। परेशान होकर सूर्यदेव को भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी इसके बाद भगवान शिव ने सूर्यदेव को उनकी गलती का अहसास करवाया।

सूर्यदेव अपने किये का पश्चाताप करने लगे और अपनी गलती के लिये क्षमा याचना की। इस पर उन्हें फिर से अपना असली रूप वापस मिला। लेकिन पिता पुत्र का संबंध जो एक बार खराब हुआ फिर न सुधरे आज भी शनिदेव को अपने पिता सूर्य का विद्रोही माना जाता है।

फलित ज्योतिषी में शनि को एक क्रूर ग्रह माना जाता है। इससे संबंधित भी एक कथा है। ब्रह्म पुराण की एक कथा के मुताबिक बचपन से ही शनि देव भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। वह श्रीकृष्ण की भक्ति में सदैव लीन रहा करते थे। वयस्क होने पर शनिदेव के पिता ने चित्ररथ की कन्या से उनका विवाह करा दिया था। शनिदेव की पत्नी सती-साध्वी और परम तेजस्विनी थी।

एक रात वह ऋतु स्नान करके पुत्र पाने की इच्छा से शनिदेव के पास पहुंची, लेकिन शनिदेव श्रीकृष्ण के ध्यान में इस कदर खोए हुए थे कि उन्हें इस संसार की कोई सुध नहीं थी, इसलिए शनिदेव की नज़र उन पर नहीं पड़ी। शनिदेव उनकी तरफ एक बार देख लें इसके लिए उनकी पत्नी ने बहुत देर तक प्रतीक्षा की और वे प्रतीक्षा करते-करते थक गईं, जिससे उनका ऋतुकाल भी निष्फल हो गया।

गुस्से में आकर शनिदेव की पत्नी ने उन्हें श्राप दे दिया कि पत्नी होने पर भी आपने मुझे कभी प्यार से नहीं देखा। अब आप जिसे भी देखेंगे उसका कुछ-न-कुछ अनिष्ट होगा। यही वजह है कि शनि की दृष्टि को क्रूर माना जाता है।

न्याय के देवता

शनिदेव नीतिगत न्याय करते हैं। कहते हैं कि शनि के वक्री होने से लोगों को पीड़ा होती है। इसीलिए शनि की दशा से पीड़ित लोगों को शनि जयंती के दिन उनकी पूजा-आराधना करनी चाहिए। यह न्याय के देवता हैं, योगी, तपस्या में लीन और हमेशा दूसरों की सहायता करने वाले होते हैं।

शनि ग्रह को न्याय का देवता कहा जाता है। यह जीवों को सभी कर्मों का फल प्रदान करते हैं। शनिदेव का नाम या स्वरूप ध्यान में आते ही मनुष्य भयभीत अवश्य होता है, लेकिन कष्टतम समय में जब शनिदेव से प्रार्थना कर उनका स्मरण करते हैं तो वे ही शनिदेव कष्टों से मुक्ति का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण

शनि को समस्त ग्रहों में सबसे शक्तिशाली ग्रह माना गया है। शनि देव के शीश पर अमूल्य मणियों से बना मुकुट सुशोभित है। शनि देव के हाथ में चमत्कारिक यंत्र है, शनिदेव न्यायप्रिय और भक्तों को अभयदान देने वाले देव माने जाते हैं। शनिदेव प्रसन्ना हो जाएं तो रंक को राजा और क्रोधित हो जाएं तो राजा को रंक भी बनाने में देरी नहीं लगाते हैं।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि का फल व्यक्ति की जन्म कुंडली के बलवान और निर्बल होने पर तय करते हैं कि जातक को शनि प्रभाव से बचने के लिए क्या-क्या उपाय करने चाहिए। शनि पक्षरहित होकर अगर पाप कर्म की सजा देते हैं तो उत्तम कर्म करने वाले मनुष्य को हर प्रकार की सुख-सुविधा एवं वैभव भी प्रदान करते हैं।

फलित ज्योतिष के अनुसार 9 ग्रहों में शनि का स्थान सातवां है। ये एक राशि में तीस महीने तक रहते हैं तथा मकर और कुंभ राशि के स्वामी माने जाते हैं। शनि की महादशा 19 वर्ष तक रहती है। शनि की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी से 95 गुणा ज्यादा मानी जाती है।

माना जाता है इसी गुरुत्व बल के कारण हमारे अच्छे और बुरे विचार चुंबकीय शक्ति से शनि के पास पंहुचते हैं जिनका कृत्य अनुसार परिणाम भी जल्द मिलता है। असल में शनिदेव बहुत ही न्यायप्रिय राजा हैं। यदि आप किसी से धोखाधड़ी नहीं करते, किसी के साथ अन्याय नहीं करते, किसी पर कोई जुल्म अत्याचार नहीं करते, कहने का तात्पर्य है यदि आप बुरे कामों में संलिप्त नहीं हैं तब आपको शनि से घबराने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि शनिदेव भले जातकों को कोई कष्ट नहीं देते।

Posted By: Sandeep Chourey