मल्टीमीडिया डेस्क। पूर्वज देवता नहीं होते हैं, लेकिन उनको उनके परिजन देवतुल्य मानते हैं और उनको दिवंगत होने पर भी बड़ा मान-सम्मान देते हैं और उनकी मृत्यु के बाद उनकी आत्मा की शांति के लिए कई प्रकार के क्रियाकर्म करते हैं। इन क्रियाकर्मों में श्राद्धकर्म एक महत्वपूर्ण कर्मकांड है, जो खास तिथियों पर किया जाता है। श्राद्धकर्म से पितृों की आत्मा तृप्त होती है और अपने परिजनों को बेहतर जिंदगी का आशीर्वाद देते है।

देवकर्म के पूजा विधान और पितृों के निमित्त श्राद्धकर्म में अंतर होता है। कुछ बातें जो देवकर्म में निषेध होती है वो श्राद्धकर्म में खास हो जाती है। इसलिए पितृकर्म करते समय कुछ खास बातों का ख्याल रखना पड़ता है और शास्त्रोक्त विधि से इन नियमों का पालन करते हुए पितृकर्म संपन्न किए जाते हैं।

पितृ के निमित्त सूर्य को जल अर्पित करें

जिस तिथि को आपके पूर्वजों का श्राद्ध हो उस दिन सूर्योदय के पूर्व उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं। सूर्योदय के समय पितृों के निमित्त भगवान सूर्यदेव को जल अर्पित करें। इसके बाद घर की रसोई को शुद्ध जल से स्वत्छ करें और पितरो को जो व्यंजन प्रिय है उनको बनाएं। तैयार भोजन सामग्री को एक थाली मे रख ले और पंच बलि के लिए पांच जगह 2-2 पुड़ी या रोटी जो भी पकाया गया है उस पर थोड़ी खीर रख कर पांच पत्तलों पर रख ले|

गाय के गोबर के बने कंडे या उपले को जलाकर रख दे। अब पितृ-कर्म के लिए घर की दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके आसन पर बैठ जाये| अपने समक्ष जिस पितृ का श्राद्ध हो उनकी तस्वीर अपने सामने रखे। पितृपूजा में यह ख्याल रहे कि रोली, चावल नहीं अर्पित किए जाते हैं। पितृों को सफेद चंदन अर्पित करने का प्रावधान है। पितरों को सफेद फूल अर्पित करें। चंदन का टीका लगाएं। पितृ के चित्र के समक्ष अगरबत्ती और शुद्ध गाय के घी का दीपक जलाए।

पितृ से मांगे सुख-समृद्धि का आशीर्वाद

दोनों हाथ जोड़ कर अपने पितृों से बेहतर जीवन की प्रार्थना करे और जाने अनजाने मे हुई गलती के लिए क्षमायाचना करें| अपने घर की सुख शांति और समृद्धि का आशीर्वाद उनसे मांगे और उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित करें| भोजन की थाली में व्यंजन परोसकर और पांच जगह जो पितृों की बलि रखी है उसे पितृों की तस्वीर के समक्ष रख दे| जलाकर रखे गए कंडे पर भोजन सामग्री मे से थोड़ी - थोड़ी सामग्री निकालकर उनको भोग लगाए। इस तरह भोग लगाने की प्रक्रिया को धूप देना कहते हैं। इस बात का ध्यान रहे कि जब तक हम पितृों को धूप नहीं देंगे वह घर का भोजन ग्रहण नहीं करेंगे और अतृप्त ही रहेंगे। धूप से उठने वाली सुगंध से ही पितृ भोजन ग्रहण करते है|

धूप देने के बाद अपने सीधे हाथ मे जल लेकर भोजन की थाली के चारों और तीन भर घुमाएं और इसके बाद अंगुठे की तरफ से जल जमीन पर छोड़ दे| जल के अंगूठे से छोड़ना जरूरी है क्योंकि जब हम अंगुलियों की तरफ से जल छोड़ते है तो उस जल को देवता ग्रहण करते है और जब हम अंगूठे की तरफ से जल छोड़ते है तो वह जल पितृ ग्रहण करते है| धूप और जल छोड़ने की क्रिया संपन्न होने के बाद एक बार फिर पूर्वजों का आशीर्वाद लें।

ब्राह्मण को भोजन करवाकर आशीर्वाद ले

अब निकाली गई पांच बलि मे से एक एक बलि क्रमश: गाय को, कुत्ते को, कौए को, एक किसी भी भिक्षाटन करने वाले को और एक चींटी को दे दे। भोजन की थाली घर मे बुलाये ब्राह्मण के सामने आदरपूर्वक रखें| उनको आतिथ्यभाव और आत्मीयता से भोजन करवाएं। भोजन के पश्चात ब्राह्मण देवता के चरण छूकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करे और उनको यथाशक्ति दक्षिणा, वस्त्र आदि दे कर विदा करे|

Posted By: Yogendra Sharma