उज्जैन। इन दिनों श्राद्ध पक्ष में देश विदेश से हजारों श्रद्धालु पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान करने के लिए धर्मनगरी उज्जयिनी में आ रहे हैं। रामघाट, सिद्घवट व गयाकोठा पर तीर्थ श्राद्ध करने वालों का तांता लगा हुआ है। तीर्थपुरोहित वंशावली के आधार पर अपने यजमानों से पितृकर्म करा रहे हैं। पुजारियों के पास 500 साल का रिकॉर्ड उपलब्ध है। इसमें यजमानों की सात पीढ़ियों तक के नाम हैं। तीर्थ पुरोहित पं.राजेश त्रिवेदी 'आमवाला' ने बताया ये एक तरह का सोशल सॉफ्टवेयर है जिसे हमारे पुरखों ने सालों पहले तैयार कर लिया था। इसकी मदद से हम यजमानों को मिनटों में उनकी कई पीढ़ियों से रूबरू करा देते हैं। इसके लिए कोई कम्प्यूटर आदि की जरूरत नहीं पड़ती।

तीर्थपुरोहितों का आपसी तालमेल भी गजब का है। अगर कोई व्यक्ति पहली बार तीर्थ पर पितृकर्म करने आया है, तो उसे अपने पुरोहित को ढूंढने की आवश्यकता नहीं है। घाट पर मौजूद पंडे उस व्यक्ति गौत्र आदि के आधार पर अपने पुरोहित तक पहुंचा देते हैं। पुरोहित वंशावली में देखकर संबंधित के पुरखों का नाम आदि की जानकारी देते हैं। मिलान होने पर पितृकर्म कराए जाते हैं। इसके बाद आए हुए व्यक्ति से परिवार के अन्य सदस्यों की जानकारी लेकर वंशावली में अंकित कर दी जाती है। यह प्रक्रिया निरंतर चली आ रही है।

उपनाम से तीर्थ पुरोहितों की पहचान

तीर्थ पुरोहितों के उपनाम ही उनकी पहचान है। तीर्थ नगरी में डब्बावाला, नाहर वाला, हाथी वाला, डंडा वाला, लोटा वाला, कुंड वाला आदि कई उपनाम हैं, जो तीर्थ पुरोहितों को पहचान देते हैं। पं.त्रिवेदी ने बताया उनके परिवार का उपनाम 'आमवाला' है। वजह पुराने समय में लोग पड़ना लिखना कम जानते थे, ऐसे में सरलता से पहचान के लिए तीर्थ पुरोहितों ने अपने नाम के आगे उपनाम लगाना शुरू कर दिया। आज देश विदेश से आने वाले भक्त इन्हीं उपनामों के जरिए उन तक पहुंचते हैं।