उज्जैन। पुराणों में वर्णित प्राचीन अवंतिका नगरी, जिसे मौजूदा दौर में उज्जैन के नाम से जाना जाता है। यूं तो मोक्षदायिनी शिप्रा के घाटों और श्री महाकालेश्वर की भस्मारती के लिए विश्वभर में यह शहर अपनी पहचान रखता है लेकिन यहां पर कई ऐसे मंदिर भी हैं जो कि श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं।

ऐसे ही कुछ मंदिरों में प्रमुख है, गौरीनन्दन श्री गणेश का चिंतामन धाम। उज्जैन के ग्राम चिंतामन को भगवान के इसी मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में आने वाले की सभी मन्नतें तो पूरी हो जाती हैं साथ ही किसी कारणवश मुहूर्त के बिना मांगलिक कार्य करने वालों के लिए यहां पाती के लग्न निकाले जाते हैं।

मध्यभारत का पौराणिक नगर, उज्जैन अपने सांस्कृति वैभव के लिए जाना जाता है। यहां पर हर दिन कोई न कोई उत्सव मनाया जाता है। साथ ही यहां लगभग हर कदम पर मंदिर और दर्शनीय स्थल मौजूद हैं। इस शहर को लेकर एक कहावत है कि यदि कोई बैलगाड़ी में अनाज की बोरियां लादकर ले जाए और एक-एक मुट्ठी अनाज यहां के मंदिरों में अर्पित करे, तो बारियों में भरा हुआ अनााज समाप्त हो जाएगा मगर, कुछ मंदिर ऐसे रह जाएंगे जहां अनाज नहीं चढ़ाया जा सका।

ऐसे ही शहर में प्राण प्रतिष्ठित है श्री चिंतामन गणेश का मंदिर। यहां शिवसुत गजानन अपने तीन स्वरूपों में प्राण प्रतिष्ठित हैं। जिसमें एक स्वरूप है श्री चिंतामन, दूसरा सिद्धिविनायक गणेश और तीसरा इच्छामन। भगवान अपने इन तीनों रूपों में श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण करते हैं।

मंदिर को लेकर किवदंती है कि भगवान गणेश एक वटवृक्ष में से प्रकट हुए थे। त्रेता युग में भगवान श्री राम जब राजा दशरथ का श्राद्ध कर्म करने आए थे, उसी दौरान शिप्रा नदी के दक्षिण तट पर उनका आना हुआ था। भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी ने यहां पूजन किया था। कहा जाता है कि श्री गणेश के इन तीनों स्वरूपों का पूजन भगवान श्री राम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण ने किया था। प्राचीन युग में यहां जंगल था, यहां भगवान श्री राम ने माता सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ विश्राम किया।

मंदिर इतना जागृत है कि यहां आने वाले की हर मन्नत पूरी होती है। श्रद्धालु नया वाहन खरीदने पर, घर में मांगलिक कार्य होने पर सबसे पहले यहां आकर बप्पा को निमंत्रण देना नहीं भूलते। यहां बिना मुहूर्त के ही, मांगलिक कार्य संपन्न करवाए जाते हैं। मान्यता के अनुसार जब कुछ लोग मंगलकार्य को लेकर निकाले जाने वाले मुहूर्त के पसोपेश में होते हैं तो उन्हें यहां आकर समाधान मिल जाता है।

भगवान की आरती में उपयोग किए जाने वाले फूल उनके चरणों में से लेकर मुहूर्त लिखवाने आए भक्त को दे दिए जाते हैं। भक्त फूल लेकर अपने घर चले जाते हैं। फूल इस बात का प्रमाण होते हैं कि भक्त बिना मुहूर्त के ही शुभकार्य कर सकता है और चिंतामन उसके कार्य को सफल करेंगे। इसके बाद जब लग्न या शुभकार्य संपन्न होता है तो श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं।

लक्ष्मण ने चलाया था बाण, फूट पड़ा था झरना

कहा जाता है कि पूजन के लिए मात सीता को जल की आवश्यकता थी जिसके लिए लक्ष्मण जी ने अपने धनुष से बाण चलाया, जिसके बाद यहां पानी की आव फूट पड़ी, कालांतर में यहां बावड़ी का निर्माण हुआ।

भगवान श्री गणेश अपने तीनोंं स्वरूपों में इस मंदिर में विराजित हैं। शायद इस तरह का यह पहला मंदिर है। त्रेता युग में जब भगवान श्री राम उज्जैन आए थे। तब शिप्रा के दक्षिण तट पर आने के दौरान उन्होंने यहां पूजन किया था। किवदंती है कि भगवान गणेश एक वट वृक्ष मेंं से प्रकट हुए थे। यहां आने वाले की सारी चिंताएं दूर होती है और श्रद्धालु को सिद्धी मिलती है। - पंं. गणेश गुरू-पुजारी श्री चिंतामन गणेश मंदिर, उज्जैन

भगवान चिंतामन गणेश के मंदिर में पाती के लग्न लिखवाने की परंपरा है। इसके लिए श्रद्धालु को आरती के बाद भगवान के चरणों के फूल दे दिए जाते हैं और शुभकार्य संपन्न होने के बाद भक्त यहां दर्शन के लिए आते हैं।- पं. भगवती प्रसाद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य, चिंतामन गणेश मंदिर, उज्जैन।