मल्टीमीडिया डेस्क। प्रदोष का व्रत कर शिव पूजा करने से भक्तों के सभी कष्टों का नाश होता है। प्रदोष का व्रत भगवान शिव के साथ चंद्रमा के साथ जुड़ा हुआ है। शास्त्रोक्त मान्यता है कि चंद्रमा को एक बार क्षय रोग हो गया था। इसके कारण चंद्रमा को मृत्यु तुल्य कष्ट का सामना करना पड़ा था। भगवान शिव ने त्रयोदशी तिथि को चंद्रमा के क्षय रोग का निवारण कर उनको नया जीवन दिया था इसलिए त्रयोदशी तिथि को प्रदोष के नाम से जाना जाने लगा।

प्रदोष व्रत की कथा

पौराणिक काल में एक गांव में एक गरीब पुजारी रहता था। भगवान की सेवा करते हुए पुजारी की एक दिन मृत्यु हो गई। पुजारी की असमय मृत्यु के बाद उसकी पत्नी और पुत्र भिक्षाटन कर गुजर-बसर करने लगे। वह सुबह भिक्षाटन के लिए घर से निकलती और शाम को अपने पुत्र के साथ घर आ जाती थी। ऐसे में पुजारी पत्नी की मुलाकात विदर्भ देश के राजकुमार से हुई, जो कि अपने पिता की मृत्यु के बाद दर-दर भटक रहा था। उसकी यह हालत देखकर पुजारी की पत्नी उसको अपने साथ घर लेकर आ गई और अपने पुत्र के जैसा रखने लगी।

एक दिन पुजारी की पत्नी दोनों पुत्रों को लेकर शांडिल्य ऋषि के आश्रम में गई। आश्रम में उसने ऋषि शांडिल्य से शिवजी के प्रदोष व्रत की कथा और व्रत की विधि सुनी। इसके बाद घर जाकर अब वह भी प्रदोष व्रत करने लगी।


एक बार दोनों बालक वनभ्रमण के लिए घर से निकले। कुछ देर बाद पुजारी का बेटा तो वन से घर लौट गया, लेकिन राजकुमार वन में ही रह गया। वन में राजकुमार ने गंधर्व कन्याओं को क्रीड़ा करते हुए देखा तो उनसे उसने बातचीत शुरू कर दी। राजकुमार से मित्रता करने वाली गंधर्व कन्या का नाम अंशुमती था। उस दिन वह राजकुमार वन से घर देरी से लौटा।


राजकुमार दूसरे दिन फिर से उसी जगह पर जा पहुंचा। उसने देखा कि अंशुमती अपने माता-पिता से बात कर रही थी। अंशुमती के माता-पिता ने राजकुमार को पहचान लिया और कहा कि आप विदर्भ के राजकुमार धर्मगुप्त हो ना? अंशुमती के माता-पिता ने राजकुमार के समक्ष अपनी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव रखा। राजकुमार के स्वीकृति देने के बाद दोनों का विवाह संपन्न हुआ। इसके बाद राजकुमार ने गंधर्वों की विशाल सेना के साथ विदर्भ राज्य पर हमला किया और युद्ध में जीतकर अपने राज्य को प्राप्त कर लिया। इसके बाद वह पुजारी की पत्नी और पुत्र को आदर के साथ राजमहल में ले आया और साथ रखने लगा।


एक दिन अंशुमती ने राजकुमार से इन सभी बातों के पीछे का रहस्य पूछा तो राजकुमार ने उसको दोष व्रत का महत्व और उससे मिलने वाले फल के बारे में बताया। पौराणिक मान्यता है कि प्रदोष के व्रत से मानव सभी पापकर्मों से मुक्त होकर पुण्य पाता है और इस लोक में सभी सुखों को भोगकर मोक्ष को प्राप्त करता है।

Posted By: Yogendra Sharma

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