मुनि संबोध कुमार

जीवन के जितने भी रंग है, एक-एक कर उन सारे रंगों में घुलकर भी जीवन रंगोली न हो सका। दर्द से भी गुजरे, प्यार का पारावार भी मिला, छप्पन लज़ीज पकवाने के परोसे और भूख ने भी कसौटियों पर कसा, तंज भी करे तो तारीफों के कसीदे भी पढ़े गए, न राग अपने बहाव में बहा ले जा सका न द्वेष अपने चंगुल में कहीं जकड़ सका, ये कैसी घाघदारी थी। महावीर बेरंग मुसाफिर हो गए थे।

जंगल के सन्नााटों में शहरों के शोर में, मन कभी विचलन का शिकार न हुआ। एक करुणा थी जो निरंतर बरसती रही। वो कब श्वेतांबर थे, कब दिगंबर हुए, उन्हें आहत भी नहीं हुई। बस होना था और हो गया। एक नियति जिसे बुननी थी वो बुन गई। महावीर का शगल सिर्फ विस्तार पाना था, तो राग रंग के मकड़जाल में उलझे बिना अपनी करुणा को आखिर बिखेरते हुए विस्तार को हासिल होते गए।

अमाप्य, अपार, अनहद, अनंत, असीम, अंतहीन करुणा का पिघलना तो कोख में ही शुरू हो गया था, वो 'पूत के पांव पालने में पता चलने" के जुमले से पहले, महावीर महसूस करने लगे-हलन चलन हाथा-पांवों में हो या सिरहन शरीर में, मां त्रिशला किसी अनजान दर्द से गुजर रही है-क्या करूं कि जननी को दर्द हो ही नहीं और फैसाल ले लिया कायोत्सर्ग में स्थिर हो जाने का... अब महावीर मुस्कुराए मगर जो हुआ वो कल्पना के इर्द-गिर्द भी न था। मां त्रिशला का रोम-रोम विचलन से भर उठा-ये क्या अनहोनी हो गई, सब कुछतो अच्छा था, ये किस कर्म का खामियाजा है?

क्यों बच्चे की अचानक हलचल बंद हो गई? क्या वो अजन्मा मेरे नसीब में नहीं था, और ऐसे अनगिन सवाल? जिनके जवाब की टोह में जाने कितने उधेड़बुन बुन चुकी थी मां त्रिशला। महावीर के बदन से सुरसुरी बना लिया था, मगर मां को ये क्या हो गया?

मां तो किसी मुरझाएं फूल-सी कुमल्हा गई, नहीं, मां अगर मेरे इस फैसले से आहत है तो ये मैं इस फैसले पर नहीं ठहर सकता... और महावीर का मन रीस गया, चंचलता के कर्म फिर शुरू हो गए। और शुरू हो गया फिर कुछ घंटों पहले ठहरा उत्सव। वाह ही करुणा सागर री करुणा... सारी सीमा, सारी हदें... सारी सरहदें लांघ गई।

तकलीफ किसी और को हो सिहर उठता महावीर का रोम-रोम, दुख से कोई गुजरता... आंख महावीर की नम हो जाती, ये प्रशस्त था पुरी सृष्टि के लिए, न कोई बड़ा, न कोई छोटा, न अमीर-न गरीब... जो भी कायनात में सांस ले रहा है हर उस जीव जे लिए 'आय तुले पयासू" का बर्ताव। एक सुबह मां त्रिशला महावीर को अपने साथ तालाब किनारे ले आई और एक ही सांस में कह गई - 'जाओ वत्स, जितनी चाहे क्रीड़ा करो।" महावीर नि:शब्द खड़े रहे। मां ने झकझोरा - 'जाओ बेटे।"

महावीर मुखर हुए - 'मां मुझसे नहीं होगा, ये सब... ये तालाब की लहरें और इन लहरों के साथ इनमें बह रही है सूक्षम जीवों की शांति, मेरा जमीर मुझे इजाजत नहीं देता कि मैं इनसे शांति छीन लूं।" मां कुमार महावीर को विस्फारित नजर से देखती रही। कुछ मिनटों के बाद जब तिलस्म टूटा तो मां ने होंठों पर स्मित बिखेरकर कहा 'ठीक है, नहीं जाना तो न जाओ। चलो घर चलते हैं।"

सारी कायनात को शरीर का सुख दिखता है मगर महावीर को आत्मा का... वे उस सुख की टोह में थे जो एक बारगी मिल जाए तो फिर रीते ही नहीं... अखंड, अटूट अनुबंध में बंधना चाहते थे महावीर...और अहिंसा इस बंधन की ओर पहला पड़ाव था। महावीर की अहिंसा महज किसी के 'प्राणहरण" न करो के दायरों में कैद नहीं थी। उस अहिंसा के शब्दकोष में एक और ब्रह्मवाक्य लिखा - 'किसी के लिए मन में बुरे विचारों को उगने न दे और अहिंसा की परिभाषा संवेदना की इस ऊंचाई पर पहुंचकर संपूर्णता ओढ़ लेती है।

अहिंसा का मतलब वही जानते हैं

जो इंसान को सही मायने में इंसान मानते हैं

महावीर बचपन की देहरी पार कर जवां हुए, अपने कक्ष के बाहर किसी के सुबकने की आवाज का छोर थामकर वो दासी तक पहुंच गए, वो दासी ही थी जो सुबक-सुबक कर रोए जा रही थी और आंसुओं की एक-एक बूंद साफ करने के लिए पड़े बरतनों पर गिरते हुए टप-टप शब्द को अर्थ दे रहे थे।

महावीर प्रश्नावाचक नजर से कबी दासी तो कभी जूठे बर्तनों को निहार रहे थे... कोई जवाब नहीं मिला तो खुद ने दासी से पूछ लिया 'क्या बात है दासी तुम क्यूं रो रही हो? क्या तुम्हें कहीं दर्द महसूस हो रहा है? या कोई बात है जो तुम्हें रह-रहकर सता रही है, या तुम्हारे साथ कुछ गलत हो गया?" महावीर प्रश्न पर प्रश्न दागते रहे और दासी का फफकना जारी रहा।

कुछ कहो तो सही - हो सकता है कि मैं तुम्हें तुम्हारी समस्या से निजात दिलाने में सहभागी बन जाऊं, महावीर ने आश्वासन दिया, तो सुबकते-सुबकते ही दासी एक ही सांस में कह गई - आज हमारे गांव में महोत्सव है, कुमार... मगर अफसोस कि यहां इतने सारे काम है, मैं उन्हें पूरा करूं तब तक महोत्सव संपन्ना हो जाएगा...।"

महावीर को समझते देर नहीं लगी। बस इतनी सी बात- 'चलो हम और तुम साथ-साथ कर लेते हैं सारा काम, बाकी तुम मुझ पर छोड़ दो, फिक्र मत करो, मैं सब संभाल लूंगा और हां तुम्हें मां की झिड़कियां न सुननी पड़े, इसलिए मेरा रथ लेकर जाओ ताकि वापिस जल्द लौट सको। रोना बंद करो और मुस्कुराते हुए जाओ।" दासी की उदासी चकनाचूर होकर मुस्कुराहत में तब्दील हो गई। वो बार-बार महावीर का आभार व्यक्त करते हुए विदा हुई।

महावीर की करुणा ही मोक्ष है, करुणा जो बांधती नहीं है किसी को किसी से, जो उलझाती नहीं... भावुक नहीं बनाती... राग के दलदल में धंसाती नहीं बस मुक्त करती है, वो करुणा की पराकाष्ठा ही तो थी - जो चाबुक से मारने को मुस्तैद ग्वाल पर क्षमा बनकर बरसती है, चण्डकौशिक के डसने के बाद अमीझर होकर नयनों से छलती है, संगम के 20 मारणांतिक कष्टों के बावजूद अभयदान का रूप लेकर प्रकट होती है, गौशालक के विद्रोह के बाद भी होंठों के स्मित से निखरती रही।

ये जो 'जिओ और जीने दो" के गगनभेदी नारे लगाकर हम दम भर रहे हैं कि महावीर ने कहा - महावीर ने ये कहा या नहीं स्पष्ट कारण के तल तक पहुंचने में उलझने हजारों और रास्ता एक भी नहीं, अगर महावीर ने कहा भी होगा तो कुछ यूं ही कहा होगा - शांति से जिओ और शांति से जीने दो। इस महावीर जयंती पर पड़ताल करें अपनी जीवनशैली की, कि क्या हमने जीवन के आसपास महावीर की करुणा को अपने मन की संवेदना बनने की इजाजत दी है? अगर हां तो! महावीर हर घर में है, महावीर हर दर पे है।

त्याग की बात तो हर कोई करता है

सत्य का नारा तो हर कोई कहता है

उतारे कथनी को करनी बनाकर जीवन में

ऐसे महावीर तो एकाध हुआ करता है।

Posted By: Sandeep Chourey