मल्टीमीडिया डेस्क। उत्पन्ना एकादशी को तिथियों में शुभ तिथि माना जाता है। इस उपवास और श्रीहरी की उपासना से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस बार उत्पन्ना एकादशी 22 नवंबर शुक्रवार को है। इस बार उत्पन्ना एकादशी दशमी युक्त उत्पत्तिका, उत्पन्ना और वैतरणी एकादशी है। जिस तिथि में एकादशी, द्वादशी और त्रयोदशी तिथि भी हो, वह बड़ी शुभ मानी जाती है। इस तरह की एकादशी को एक बार करने से सौ एकादशी के व्रत का फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि इसी दिन एकादशी माता श्रीहरि के शरीर से प्रगट हुई थी। एकादशी तिथि को उपवास, आराधना, पवित्र नदियों, सरोवरों और कुंडों में स्नान का बड़ा महत्व बताया गया है।

एकादशी तिथि का विधि-विधान से व्रत करने पर शंखोद्धार तीर्थ में स्नान कर भगवान के दर्शन करने के बराबर फल मिलता है। व्यतिपात के दिन दान देने का लाख गुना फल की प्राप्ति होती है, संक्रांति से चार लाख गुना फल और सूर्य और चंद्र ग्रहण में स्नान-दान करने से जिस पुण्य फल की प्राप्ति होती है, उस फल की प्राप्ति मात्र एकादशी का व्रत करने से मिल जाती है।

अश्वमेध यज्ञ करने से सौ गुना, एक लाख तपस्वियों को साठ साल तक भोजन कराने से दस गुना, दस ब्राह्मणों या सौ ब्रह्मचारियों को भोजन कराने से हजार गुना ज्यादा पुण्य फल भूमि का दान करने से मिलता है। उससे भी हजार गुना ज्यादा पुण्यफल कन्यादान करने से प्राप्त होता है और इससे भी दस गुना ज्यादा पुण्यफल की प्राप्ति विद्यादान करने से होती है। विद्यादान से दस गुना ज्यादा पुण्यफल भूखे को भोजन कराने से मिलता है। लेकिन एकादशी के व्रत का पुण्य इन सभी में सर्वश्रेष्ठ होता है।

उत्पन्ना एकादशी को करे यह काम

उत्पन्ना एकादशी तिथि का व्रत करने वाले भक्तों को दशमी तिथि से व्रत का पालन करना चाहिए। एकादशी तिथि का व्रत दो प्रकार से करने सा प्रावधान है। निर्जला और फलाहारी। व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्रत का पालन कर सकता है। इस स्नान आदि से निवृत्त होकर भोर में सूर्य को अर्घ्य दे और अर्घ्य के जल में हल्दी डालें। भगवान विष्णु को तुलसी दल अर्पित करें। श्रीहरी की उपासना बगैर तुलसी के अधूरी मानी जाती है।

उत्पन्ना एकादशी को न करे यह काम

.उत्पन्ना एकादशी के दिन चावल का सेवन न करे। इस दिन चावल का सेवन करने से पुण्यफल में कमी आती है और पाप लगता है। एकादशी का व्रत करने वालों को किसी दूसरे व्यक्ति के घर पर या उसके द्वारा दिया गया खाना नहीं खाना चाहिए। इससे व्रत का फल खाना खिलाने वाले व्यक्ति को मिल जाता है। इस दिन तामसिक आहार से दूरी बनाए रखें। मांसाहार, प्याज, लहसुन, शराब, मसूर की दाल आदि ग्रहण न करें। भगवान विष्णु को पान समर्पित करें, लेकिन खुद पान को न खाएं। इस दिन घर में झाड़ू लगाने से परहेज करें। कांसे के बर्तन में भोजन न करें। परनिंदा, छल-कपट, लालच, भोग-विलास, काम आदि से परहेज करें। सदाचार का पालन करें और सात्विक तरीके से दिन व्यतित करें।

Posted By: Yogendra Sharma